उषा मेहता

उषा मेहता स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी नायिका रहीं जिसने सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत रेडियो की स्थापना कर अल्पायु व अनुभवहीनता के बावजूद जोखिम भरा कदम उठाकर देश सेवा के महत्त्वपूर्ण कर्तव्य को पूर्ण किया।

सूरत (गुजरात) के निकटवर्ती गाँव सरस में 25 मार्च 1920 को जन्म लेने वाली उषा को बालपन से ही बालसुलभ खिलौनों की अपेक्षा बम पिस्तोल आदि खिलौने अच्छे लगते थे। उन्हीं दिनों गाँधी जी ने महिलाओं और युवा वर्ग का आह्वान करते हुए शिविर का आयोजन उनके निकटवर्ती गाँव में किया तो यह नन्हीं बालिका छात्रा स्वतंत्रता सेनानियों की अग्रिम में जा खड़ी हुई और चरखे पर कताई भी की। तभी से इन्होंने खादी पहनने और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का प्रण किया।

1928 में मात्र 8 वर्ष की उम्र में साइमन कमीशन के विरोध में निकले जुलूस में भाग लेकर ब्रिटिश राज का विरोध किया। इनके पिता ब्रिटिश राज के अधीनस्थ एक जज थे, वे इनके स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने पर नाराज होते थे। इसलिये पिता के सेवानिवृत्त हो जाने पर 1932 में इनका परिवार बम्बई जा बसा ताकि इन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने से रोका जा सके। परन्तु इन्हें तो एक ही जुनून ने घेरा हुआ था इसलिये ये अन्य बच्चों के साथ मिलकर ने क्लेंडेस्टाइन बुलेटिन और प्रकाशन का वितरण करती थीं। जेलों में क्रांतिकारियों और उनके रिश्तेदारों से मिलने जाना और उनके संदेश बाहर लेकर आना इनकी जीवनधारा का हिस्सा बन चुका था।

बम्बई विश्वविद्यालय से एलएलबी करने के पश्चात एम.ए. दर्शनशास्त्र में प्रवेश लिया ही था कि 1942 का भारत छोड़ों आंदोलन छिड़ गया तो ये पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में कूद पड़ी। बापू का दिया नारा ‘करो या मरो’ निरन्तर उनके मन में गूंजने लगा और इनका मन कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने की योजनाएं बनाने लगा और आखिर एक दिन एक गुप्त रेडियो स्थापित करने का निर्णय ले ही डाला। इनका कहना था कि जब सारे बड़े नेता जेल में हैं, प्रेस पर सेंसर हैं, आजादी की आवाज दबा दी गई है… मैं देशवासियों तक अपनी और भूमिगत नेताओं की आवाज पहुँचाने के लिये एक गुप्त रेडियो चलाऊँगी, चाहे इसके लिये मुझे कुछ भी करना पड़े।

पिताजी पर कोई आँच न आये मित्रों से सलाह मशविरा कर पैसे के प्रबंध के लिये प्रयास आरम्भ हो गये। एक देशभक्त रिश्तेदार महिला से इस कार्य के लिये पैसा और आभूषण मिल गए। बाबूभाई नामक एक विश्वस्त साथी की मदद से 9 अगस्त 1942 के आंदोलन के आरम्भ होने के मात्र 5 दिन बाद 14 अगस्त 1942 को उषा जी के गुप्त रेडियो ने अपना गुप्त प्रसारण आरम्भ कर दिया। ऐसे समय, जब पूरी सरकारी मशीनरी गुप्त रेडियो की खोज के लिये सतर्क थी, यह कोई आसान काम नहीं था। इनका रेडियो निरन्तर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ों’ के नारे लगाता था और क्रांतिकारियों के बम केस, जमशेदपुर की हड़ताल और चिमूर व आष्टी के गाँवों में महिलाओं के साथ बर्बर व्यवहार की खबरें प्रसारित करता। ब्रिटिश सरकार की पैनी नजरें इसे खोज रही थीं और भनक लगते ही 12 नवम्बर 1942 की रात को छापामार कर गुप्त स्टेशन पकड़ा लिया उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली गई। टौर बाबूभाई और उषाजी दोनों को रेडियो षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिया गया। इन्हें चार साल जेल में काटने पड़े। मार्च 1946 को इन्हें प्रथम राजनीतिक कैदी के तौर पर मोरारजी देसाई के

आदेश पर रिहा किया गया। जोकि तत्कालीन अंतरिम सरकार के गृहमंत्री थे। 1946 में रिहा होने के बाद उषा जी ने अपना छूटा अध्ययन आगे बढ़ाया, एम.ए. किया। 1953 में बम्बई विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र की प्रवक्ता हुई और सार्वजनिक क्षेत्र में निरन्तर कार्यरत रहीं।

इनकी महत्वपूर्ण सेवाओं को देखते हुए इन्हें स्वतंत्रता सेनानी ताम्रपत्र के अलावा, 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। अगस्त 2000 को से 80 वर्ष की वृद्धावस्था में इस लोक से परलोक को गमन किया।

उर्मिला देवी शास्त्री

• उर्मिला चाहे किसी भी युग से सम्बन्ध रखती हो वह सदैव अनुकरणीय रही है। चाहे वह त्रेता युग की रघुकुल वधु उर्मिला हो या आज के युग के शास्त्री कुल की वधु उर्मिला देवी शास्त्री हो उर्मिला देवी शास्त्री का जन्म 20 अगस्त 1909 को श्रीनगर (उत्तराखण्ड) में हुआ। परन्तु उनकी कर्मस्थली बना क्रांतिधरा मेरठ।

उर्मिला देवी के व्यक्तित्व में एक संवेदनशील लेखिका, एक जुझारू सम्पादक और एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी के गुण विद्यमान थे। इनके पिता लाला चिरंजीतलाल, स्वामी दयानन्द सरस्वती के भक्त और एक प्रमुख आर्य समाजी थे। इसीलिये अनुशासन और संयम के संस्कार इन्हें विरासत में मिले थे। इन्होंने मिडिल पास करने के बाद घर पर ही अंग्रेजी और संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया और कई शास्त्रीय परीक्षाएं पास की। फिर आर्य गुरुकुल देहरादून में कुछ समय तक अध्यापन भी किया। देश सेवा की लगन उनके भीतर सेठ जमनालाल बजाज ने जगाई।

सन् 1929 में इन्होंने मेरठ के प्रो. धर्मेन्द्र शास्त्री के साथ सिविल विवाह किया और मेरठ में बस गई। यह विवाह उनके लेखन और महिला उत्थान के कार्यों में सहायक सिद्ध हुआ अपने आसपास की महिलाओं को जागृत किया और 1930 में एक कुशल महिला संगठक और समर्पित स्वतंत्रता सेनानी बनकर उभरीं। मेरठ के नौंचदी मेले में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार आंदोलन चलाने वाली महिला टोली की कमाण्डर बनीं। कुल तीस स्वयं सेविकाओं की उनकी उम्र महिला टोली ने विदेशी कपड़ों की अस्सी प्रतिशत दुकानें बंद करवा दी थीं। सत्याग्रह समिति बनाकर उसमें तीन हजार महिलाओं को संगठित कर उन्हें सात टोलियाँ में बाँटकर विभिन्न क्षेत्रों में काम सौंपा और स्वयं उनका नेतृत्व तथा कार्य संयोजन किया। उनकी संगठन क्षमता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि छह घण्टों के भीतर उन्होंने बाइस सौ व्यक्तियों से प्रतिज्ञा पत्र भरवाए और नगर में महिलाओं की कुल 34 सभाएं आयोजित की। 17 जुलाई को मेरठ के प्रसिद्ध नेता पं. प्यारे लाल शर्मा की गिरफ्तारी पर उन्हें दस हजार लोगों की सभा में उग्र भाषण देने पर गिरफ्तार कर लिया गया।

1932 में घर में दो छोटे बच्चों को छोड़कर छह महीने के लिये जेल गईं। जहाँ उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। जेल से छूटकर दो महीने स्वास्थ्य सुधार में लगाने के उपरांत उन्होंने ‘जन्मभूमि’ नाम से एक दैनिक पत्र निकालना शुरु किया और उसमें देश भक्ति व समाज सुधार के लेख लिखने लगीं। 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के समय अपने उम्र सम्पादकीय लेखों के कारण उन्हें गिरफ्तार कर फिर एक वर्ष के लिये जेल भेज दिया गया और उनके पत्र पर प्रतिबंध लगा दिया गया। तब भी बच्चे छोटे ही थे और उनका स्वास्थ्य भी खराब था। एक वर्ष के कारागार जीवन से छूटते ही 1942 के प्रारम्भ में फिर छह मास के लिये जेल भेज दी गई। इस बार उन्हें तन्हाई में रखा गया, बीमार तो वे थी हीं, बिना इलाज और जेल के खराब भोजन से उनकी बीमारी ने अधिक गम्भीर रूप ले लिया। तब अंतिम अवस्था में ही उन्हें जेल से छोड़ा गया। दो छोटे बच्चे और गंभीर बीमारी (गर्भाशय का कैंसर), वह चाहती तो माफी माँगकर जेल से छूट सकती थी परन्तु देश की आजादी को सर्वोपरि मानने वाली स्वाभिमानी उर्मिला देवी शास्त्री ने मात्र तैंतीस वर्ष की अल्पायु में ही मृत्यु को स्वीकार किया। उन्होंने अपने 1930-32 के जेल जीवन के संस्मरण ‘कारागार के अनुभव’ शीर्षक से लिखे, जिन्हें साहित्य अकादमी द्वारा स्वतंत्रता स्वर्ण जयंती वर्ष 1998 में प्रकाशित किया। उनकी कार्यस्थली शहर मेरठ में की एक सड़क का नामकरण उनके नाम पर उर्मिला देवी शास्त्री मार्ग किया गया।

देवी मैना

“पिताजी! हम महल को किसी सेवक की देख-रेख में छोड़ दे या सूना छोड़ दें, उससे क्या अन्तर पड़ता है। प्रश्न तो इस बात का है कि यहाँ रहकर क्रांतिकारियों को जो सूचनाएं समय-समय पर मैं दे सकती हूँ, वे सूचनाएं सेवक तो नहीं दे सकता। इसीलिये मैं स्वयं यहाँ रहना चाहती हूँ।” यह बात नाना साहब से उनकी पुत्री देवी मैना ने उस समय कही जब अंग्रेजों की विजय का क्रम प्रारम्भ हो चुका था। छिन्न-भिन्न सेना को एकत्र कर एक और संगठित मोर्चा लेने की तैयारी के लिये नाना साहब को बिठुर छोड़ना आवश्यक हो गया और वे बेटी को साथ ले जाना चाहते थे। पिता का दिल किसी अनहोनी की आशंका से आतंकित था परन्तु उनकी 13 वर्षीया वीर बालिका को अपने पर पूर्ण विश्वास था।

बिठूर के राजमहल में मैना देवी के कुछ सेवकों सहित अकेली रह जाने की सूचना, गुप्तचरों द्वारा सेनापति ‘हे’ को मिली तो उसने तुरन्त राजमहल पर छापा मारकर सेवकों को कैद कर लिया और राजमहल को गिराने के लिये तोपचियों को आज्ञा दी। उसी समय मैना महल के एक झरोखे से प्रकट हुई और गरजती आवाज में बोली ‘ठहरो, इस दुष्कृत्य को बंद करो, मैं चाहती हूँ कि इस महल को न गिराया जाये ? सेनापति हे से उसका वार्तालाप हुआ। तुम इस महल को क्यों बचाना चाहती हो? यह महल भयंकर विद्रोही नाना साहब का है। सरकार ने इसके नष्ट करने की आज्ञा दी है।’ और तुम इस महल को क्यों गिराना चाहते हो? सरकार का नुकसान नाना साहब ने किया है या किसी मकान ने। नाना साहब का बदला इस भवन से लेना कौन-सी वीरता है?” इस प्रकार वार्तालाप के दौरान ही मैना ने बताया कि उनकी बेटी ‘मैरी’ मैना की घनिष्ठ मित्र थी।

यह जानकर सेनापति हे के व्यवहार में नरमी आ गयी परन्तु प्रधान सेनापति जनरल आउटरम ने किसी भी प्रकार की मानवता दिखाने से इंकार कर दिया और कहा- “तोपें दागी जाएं, इस महल को ध्वस्त कर दिया जाये। परन्तु सबसे पहले इस लड़की को गिरफ्तार कर लिया जाये।” जनरल की आज्ञा से कई सैनिक महल की ओर झपटे, उन्होंने महल का चप्पा-चप्पा छान मारा पर मैना का कहीं पता न चला। जनरल को आदेश तोपे दांगी गई, महल देखते ही देखते ध्वस्त हो गया। आउटरम ने समझा लड़की महल के नीचे दबकर मर गई हो और वह चला गया।

चांदनी रात में किशोरी मैना तलधर से प्रकट होकर अपने गिरे हुए महल को निहार रही थी। वह इस बात से अनजान थी कि कोई उसे देख भी रहा है। महल के दो पहरेदारों ने उसे देखा और दबे पांव जाकर उसे गिरफ्तार कर लिया। उसे आउटरम के समक्ष प्रस्तुत किया गया। आउटरम बोल उठा-‘ आखिर तुम हमारे जाल में फंस ही गई। अब तुम्हारे हित में यही है कि तुम अपने पिता नाना साहब और क्रांतिकारियों के पते ठिकाने बता दो, नहीं तो हम तुम्हें अभी जिन्दा जला देंगे।’ मैना तुम मेरे शरीर को ही जला सकते हो, मेरी आत्मा को नहीं। अग्नि की भयंकर जलन भी मुझसे कुछ भेद नहीं निकलवा सकेगी।

आउटरम ने उसे प्रलोभन देते हुए कहा- लड़की। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? तुम अपना जीवन नष्ट करने पर क्यों तुली हुई हों। क्रांतिकारियों के भेद बता दो। हम तुम्हें छोड़ देंगे और भारी पुरस्कार भी देंगे।’ मैना- एक सच्चे क्रांतिकारी को मृत्यु भय या प्रलोभन, कोई भी कर्तव्य से विचलित नहीं कर सकता। मेरा बलिदान स्वयं ही मेरा पुरस्कार होगा।

उत्तर सुनकर आउटरम तिलमिला उठा। उसने सैनिकों को आज्ञा दी कि वे लड़की को वृक्ष से बाँध दे। सैनिकों ने अपने जनरल की आज्ञा का पालन किया। आउटरम बोल उठा- “अभी भी समय है। यदि तुम अपने पिता का पता बता दो तो हम तुम्हें छोड़ सकते हैं।”

मैना ने मुँह तोड़ जवाब दिया- “एक जन्म तो क्या, कई जन्मों तक भी तुम मुझे जलाते रहो, तो भी मैं अपने पिता और अन्य क्रांतिकारियों के भेद नहीं बता सकती। किन्तु इतना याद रखना कि अब तुम्हारे दिन आ गएं तुम्हारे अत्याचार ही तुम्हें ले डूबेंगे।

आग लगा दी गई परन्तु मैना अविचल खड़ी रही। आग बढ़ने लगीं। वह स्वयं भी क्या किसी ज्वाला से कम थी? ज्वाला ज्वाला में समा गई। पर उसका बलिदान क्रांति के इतिहास की धरोहर बन गया है।

पार्वती देवी

आजीवन नारी उत्थान की अलख जगाने वाली त्याग और तपस्या की मूर्तिमान प्रतीक- श्रीमती पार्वती देवी का जन्म 1888 में अविभाजित पंजाब के लायलपुर में हुआ। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में निहत्थे निर्दोष लोगों का नरसंहार देख उनके भीतर प्रतिशोध की अग्नि दहकने लगी। उसी क्षण से उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देशवासियों को इस क्रूर शासन से मुक्ति दिलाने के संघर्ष में ही लगा दिया। उन्होंने अमृतसर के स्वराज्य आश्रम में कई वर्षों तक निस्वार्थ सेवाएं की।

अपना खर्च जुटाने के लिये शिक्षिका पद पर नौकरी कर ली तथा बाकी बचा हुआ समय वे अन्य कार्यों के उपयोग में लगातीं। महिलाओं को प्रेरित व उत्साहित कर उन्हें मार्गदर्शन देने वाली ये पहली और अकेली महिला थी। कुछ ही वर्षों में इन्होंने राष्ट्रीय महिला समिति और कुमारी सभा की स्थापना कर • मजबूत संगठन तैयार कर लिया। सन् 1922 से 1942 के बीच इन्होंने छः बार जेल की लम्बी तथा कठोर यातनायें सहन की थीं फिर भी प्रत्येक बार और भी अधिक उत्साह एवं जोश से कार्य में जुट जाती थीं।

व्यर्थ बैठे रहना और थकना तो जैसे वे जानती हीं न हों। निरन्तर नई योजनाएं बनाना व उन्हें कार्यान्वित करना ही उसका प्रमुख उद्देश्य था। अनीति और अन्याय का विरोध करने के लिये यदि कोई साथ नहीं देता तो ये अकेली ही डटकर मुकाबला करने को तैयार रहती थीं। 1922 के बाद यह प्रथम महिला थी, जिन्होंने गांधी जी के आंदोलनों में भाग लिया। अपने देशवासियों में स्वाधीनता के भाव भरने एवं ब्रिटिश सत्ता के विरोध में खुलेआम भाषण देती और गिरफ्तार होकर जेल की सख्त सजाएं भुगततीं। फिर भी दिन दूना और रात चौगुना उत्साह बढ़ता ही जाता था।

अपनी बहनों के उत्थान के लिये उन्होंने कई कार्य सम्पादित किये। इसके लिये इन्हें द्वार-द्वार खटखटना पड़ा था तथा रुढ़िवादी महिलाओं की विभिन्न प्रकार की कटु आलोचनाएं भी सुननी पड़ी थीं। पर्दा प्रथा का इन्होंने घोर विरोध किया था। महिलाओं को चार दीवारी में बंद देखकर इन्होंने दृढ़ संकल्प लिया कि महिलाओं को वस्तुस्थिति का ज्ञान करायेंगी और उन्हें दीन-हीन स्थिति से ऊपर उठाने का भरसक प्रयास करेंगी। मद्यपान के विरुद्ध आंदोलन छिड़ा तो ये शराब की दुकानों पर जाकर धरना देतीं। विदेशी कपड़ों की होलियाँ जलाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी।

राष्ट्रीय महिला समिति में निरन्तर महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही थी। अब तक कुमारी सभा के संगठन में भी मजबूती आ गई थीं। कुछ ही समय में उनमें इतनी परिपक्वता आ गई कि असंख्य नारियाँ पार्वती जी के नेतृत्व में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन में कूद पड़ीं। टोलियाँ बना-बनाकर पिकेटिंग करतीं, धरना बढ़ गई। इस प्रकार उन्होंने कर्मनिष्ठ महिलाओं को एक सूत्र में पिरोकर मजबूत संगठन तैया कर लिया।

सन् 1922 में इन्होंने एक विशाल महिला सभा का आयोजन किया था, जिसमें अपने ओजस्वी एवं विचारोतेजक भाषणों द्वारा ब्रिटिश शासन की तीव्र भर्त्सना की थी। इस आयोजन का प्रभाव नारियाँ पर इतना अधिक हुआ कि उनमें जागरुकता पैदा हो गई। वे निर्भीकता से आंदोलनों में भाग होने लगीं। किन्तु इस आयोजन से अंग्रेज सरकार की क्रोधारिन भड़क उठी। परिणामस्वरूप इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब इनको गिरफ्तार किया गया था, तब नारियों ने मिलकर इतना लम्बा जुलूस निकाला, जिसे देखकर सभी आश्चर्य चकित हो गए। यह जुलूस करीब आधा मील लम्बा था। इस अवसर पर लाठियाँ भी चलीं। वे लाठियों की बौछारों को भी हंसते-हंसते सहन करती रहीं। अपने जीवन काल में उन्होंने पौने सात वर्ष की कठोर जेल यंत्रणाएं झेली थीं।

राष्ट्रीय महिला समिति और कुमारी सभा तथा अन्य आंदोलनों के माध्यम से नारी उत्थान की अलख जगाने वाली तथा देश-भक्ति और आजादी की भावना हर दिल में जगाने वाली पार्वती देवी ने आजीवन संघर्ष किया। इन्होंने अपने तन प्राण से देश की सेवा करते हुए शरीर को जर्जर और रुग्णावस्था तक पहुंचाते हुए 1943 में इहलोक से परलोक गमन किया।

कुमारी बीना दास

“”मैं स्वीकार करती हूँ कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में मैंने अध्यक्षता करने वाले बंगाल के अंग्रेज गवर्नर सर स्टेनले जैक्सन पर गोली चलाई। किन्तु वे अपनी पत्नी तथा बच्चों के भाग्य से बच गए। इस काण्ड के लिये मैं अकेली उत्तरदायी हूँ। किसी दूसरे का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है’ विशेष न्यायाधिकरण के सम्मुख निडर होकर बोलने वाली यह बालिका थी बीनादास। विशेष अदालत के तीनों जजों ने हत्या के प्रयास के जुर्म में बीनादास को 13 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुना दी और उसे जेल भेज दिया गया।

कु. बीनादास का जन्म 1911 में चटगाँव (बंगाल) में हुआ था। उनके पिता श्री वेणीमाधव सेन प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री तथा ब्रह्म समाजी नेता थे। बीना ने 1926 में हाईस्कूल पास कर कॉलेज में प्रवेश किया और अपने आकर्षक व्यक्तित्व एवं भावनापूर्ण विचारों से शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई। वह धार्मिक विचारों की गाँधी जी के अहिंसात्मक संघर्ष में विश्वास रखने वाली लड़की थी किन्तु अपनी बड़ी बहन कल्याणी से प्रभावित होकर गर्म दल से जुड़ गई। कल्याणी बंगाल विद्यार्थी संघ की उपाध्यक्षा व मंत्राणी थीं।

साइमन कमीशन के कारण जहाँ असहयोग आंदोलन की गति तेज हो गयी थी, वहीं दूसरी ओर बंगाल के क्रांतिकारी तरुण वर्ग में भी प्रतिशोध की ज्वाला को बुरी तरह भड़का दिया था। जिस समय गांधी जी ने डाण्डी यात्रा आरम्भ की, उसी समय बंगाल के क्रांतिकारी तरुण वर्ग ने चटगाँव का शस्त्रागार लूट लिया। अंग्रेज सरकार इस काण्ड से बौखला उठी और उसने उनका बदला लेने के लिये चटगाँव की निरपराध जनता पर अत्याचार के पहाड़ तोड़ दिये।

अपनी जन्मभूमि चटगाँव की दुर्दशा देखकर बीना का हृदय दुख एवं क्रोध से भर गया, चटगाँव काण्ड पर विचार तथा निर्णय करने के लिये क्रांतिकारियों द्वारा बुलायी गयी गुप्त मीटिंग में गवर्नर की हत्या का प्रस्ताव पास होते ही भावुक बीना ने इस काम को अपने हाथों करने का प्रस्ताव रखा जिसे स्वीकार कर लिया गया।

कु. बीना ने उस समय अंग्रेजी में ऑनर्स के साथ बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की थी और बी.टी. की तैयारी कर रही थी। दल के कई हित चिन्तकों ने बीना को यह भयानक काम हाथ में न लेने और पढ़ाई पूरी कर लेने का परामर्श दिया परन्तु बीना ने यह कहकर सबको अनुत्तर कर दिया कि आप सब या तो मुझे यह स्वर्ण अवसर देना नहीं चाहते या मेरी दृढ़ता तथा साहस पर संदेह करते हैं, सब चुप हो गये।

कु. बीना ने गवर्नर को मारने का अवसर सुनिश्चित किया – कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षान्त समारोह 6 फरवरी 1932। इसमें कुलपति की हैसियत से गवर्नर को अध्यक्षता करने आना था और बीना को भी अपनी उपाधि लेने जाना था। निश्चित दिन पर कलकत्ता विश्वविद्यालय का सीनेट हाल अतिथियों, प्रोफेसरों, अधिकारियों और उपाधि प्राप्त छात्रों से भरा था। ठीक समय पर गवर्नर ने आकर स्वागत का उत्तर दिया। वह जैसे ही अपनी कुर्सी पर बैठा वैसे ही धांय की भयानक आवाज के साथ बीना की पिस्तौल गरजी। पिस्तौल दोबारा सीधी हुई कि फिर से फायर करें, त्यों ही पास खड़े गवर्नर के एक अंगरक्षक ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

कुछ समय बाद प्रान्तीय स्वराज के अधिकार मिल जाने पर बीना को मुक्त कर दिया गया। मुक्ति के बाद से देश की स्वतंत्रता तक वे विभिन्न आंदोलनों में भाग लेती रहीं, और 1942 के भारत छोड़ों आंदोलनों में भाग लेने के कारण पुनः • जेल भेज दी गयीं।

बीना ने अपनी प्रतिज्ञा “मैं पराधीन भारत में विवाह नहीं करूंगी” का पालन हुए जब 1947 में भारत अंग्रेजी दासता से मुक्त हो गया, तब अपने करते क्रांतिकारी सहयोगी प्रोफेसर जतीश भौमिक से विवाह किया उन्होंने 1932 की अपनी अपूर्ण बी.टी. की शिक्षा को पूरी किया और कलकत्ते के एक बालिका विद्यालय में वाइस-प्रिंसीपल का पद स्वीकार कर शांतिपूर्वक जीवन यापन करने लगी। उन्होंने अपनी सेवाओं के लिए राष्ट्र या सरकार से कभी कुछ नहीं मांगा। देश को समर्पित जीवन-बीना दास ने 1989 में 78 वर्ष की आयु में अपनी देह यात्रा को पूर्ण किया। आयु में

प्रीतिलता वद्दादार

24 सितम्बर 1932 रात 9 बज का समय, चटगाँव का पहाड़वली रेलवे क्लब, अंग्रेज दम्पत्ति शराब पीकर, एक-दूसरे की कमर में हाथ डालकर नाच रहे हैं, उनके हँसी-मजाक के कहकहों से पार्टी में समा बंधा हुआ है और अचानक यह क्या हुआ? बम का धमाका ? धाँय-धाँय गोलियों की बौछार ? अंग्रेज लोग क्लब की खिड़कियों से कूद कर बाहर भागने लगे, परन्तु यह क्या! बाहर भी वही भयावह स्थिति जान बचाने के लिये लोग उलटे पाँव क्लब में घुसने लगे। 15 मिनट तक लगातार गोलियों की बौछार होती रही। कहकहे कराहों और चीत्कार में तबदील हो चुके थे।

अब प्रश्न यह है कि इस साहसपूर्ण करामात को अंजाम किसने दिया? इसे अंजाम दिया प्रीति वछादार के नेतृत्व में एक्शन करने आए आठ नवयुवकों ने। एक्शन करने आए आठों युवक साफ बच गए परन्तु उनकी नेत्री प्रीति घायल होकर क्लब से बीस फीट की दूरी पर पड़ी थी। घायल अवस्था में पुलिस के हाथों पकड़े जाने की बात सोचकर ही वह सिहर उठी। उसे इस ख्याल से भी घृणा थी। इसीलिये वह पोटेशियम साइनाइड हर समय अपने साथ रखती थी। चंद मिनटों में ही पुलिस आने वाली है यह सोच कर प्रीति ने पोटेशियम साइनाइड खाकर मृत्यु का आलिंगन कर लिया।

प्रीति एक साधारण परिवार की असाधारण बालिका थी। उसके पिता नगरपालिका कार्यालय में क्लर्क थे। वे अपना सारा वेतन घर खर्च के लिये प्रीति को दे दिया करते थे। एक बार क्रांतिकारी दल को 500 रुपये की आवश्यकता थी जिसमें से 450 रुपये वे जुटा चुके थे। 50 रुपये जुटाने के लिये जी-तोड़ मेहनत हो रही थी परन्तु सफलता मिलती नजर नहीं आ रही थी। प्रीति को पता चला तो वह चुपचाप घर से 50 रु. निकाल लाई देश सेवा में अपना सहयोग दिया। जबकि उन पचास रुपयों के कारण परिवार के मासिक में परेशानी सामना करना पड़ा।

प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्य सेन के साथ मिलकर प्रीति भूमिगत होकर क्रांति के कार्यों में सहयोग देने लगी। 5 जुलाई 1932 को पुलिस इंस्पेक्टर ने उसे पकड़ने के लिये घर पर छापा मारा तो वह पहले ही पुलिस को चकमा देकर घर से निकल चुकी थी। उसके लिये यह पहला अवसर नहीं था, जब पुलिस को चकमा देकर वह बच निकली हो।

कलकत्ता में जब रामकृष्ण विश्वास को फाँसी की सजा सुना दी गई थी तब कितने ही फर्जी नामों से जेल में जाकर उनसे मुलाकात कर चुकी थी। पर पुलिस वालों और जेल अधिकारियों ने एक भी बार उस पर शंका न की।

जब प्रीति ने ढाका विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तब वहाँ ‘दीपावली संघ’ नामक की एक संस्था थी। वह उसमें जाने लगी और लाठी तथा तलवार चलाने का अभ्यास करने लगीं। उसकी कार्य पद्धति इतनी सरल थी कि जिस छात्रावास में वह रहती थी, उसकी अधीक्षिका भी उसके क्रांतिकारी स्वरूप को न जान सकी। पुलिस को भी उसके क्रांतिकारी होने का पता तब लगा, जब उसने रामकृष्ण विश्वास पर धालघाट में एक लेख लिखा ग्रीष्मकालीन अवकाश में चटगाँव आने पर प्रीति का सम्पर्क वहाँ के क्रांतिकारियों से बढ़ा। धीरे-धीरे वह भी सक्रिय रूप से क्रांतिकारियों को सहयोग देने लगी।

प्रीति बी.ए. भी न कर पाई थी कि उसके पिता की नौकरी छूट गई, पर वह विपरीत परिस्थितियों के बीच झुकने वाली कहाँ थी? उसने पढ़ाई छोड़कर एक हाईस्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्य करना आरम्भ कर दिया जो वेतन मिलता उससे अपने माता-पिता तथा चार भाई बहनों का खर्च चलाती थी। प्रीति की मृत्यु का समाचार उसके पिता को जैसे ही मिला, वे बेहोश हो गए। प्रीति जानती थी कि उसकी मृत्यु से परिवार वालों को कितना दुख होगा पर उसने पारिवारिक कर्तव्य को राष्ट्र के कर्तव्य पर बलिदान कर दिया था।

माँ अपनी पुत्री के बलिदान पर गर्व का अनुभव करती थी। जब कभी कोई बात होती वह कहा करती थी। मेरी पुत्री ने देशहित में अपने प्राणों की बाजी लगा दी। स्वतंत्रता की देवी वीरों की बलि लेकर ही परितृप्त होती है।

झलकारी बाई

झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर 1830 ई. को झाँसी के निकट भोजला ग्राम में हुआ था। गाँव जंगलों के बीच था और आए दिन डाकुओं के हमले होते रहते थे। इसलिये झलकारी के पिता ने उसे पुत्रों के समान ही घुड़सवारी और शस्त्र संचालन की शिक्षा दी।

एक दिन बालिका झलकारी पशुओं को लेकर जंगल में गयी तो वहाँ उस पर एक चीते ने हमला कर दिया। झलकारी के पास केवल एक लाठी थी। उसने चीते की नाक पर लाठी का एक जोरदार वार किया जिससे अचेत हो चीता गिर पड़ा। इस घटना के बाद उसकी वीरता की प्रसिद्धि चारों और फैल गयी। झलकारी का विवाह रानी लक्ष्मीबाई के तोपखाने के वीर तोपची पूरन सिंह के साथ हुआ। पूरन सिंह ने ही उसका परिचय रानी से करवाया और रानी ने उसकी बहादुरी सुनकर अपनी महिला सेना में भर्ती कर लिया।

अंग्रेजों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया और किले को घेर लिया। दोनों ओर से भयंकर युद्ध छिड़ गया। परन्तु अंग्रेजों की सेना अधिक थी और गोला बारुद का भंडार भी बहुत अधिक था। तोपों से किले की दीवारों को निशाना बनाया जा रहा था। उसकी रक्षा में लगे सैनिक भी अंग्रेजों की गोलियों से घायल हो कम होते जा रहे थे।

रानी ने युद्ध परिषद की आपातकालीन बैठक बुलायी। बैठक चल रही थी कि एक प्रहरी ने सूचना दी कि एक महिला सैनिक मिलना चाहती है। महारानी से मिलने वाली वह महिला सैनिक झलकारी बाई थी। महारानी ने पूछा, “कहो, क्या बात है?

झलकारी बाई ने कहा, ‘बाई साहब, हमारे सैनिकों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, खाद्य सामग्री भी बहुत कम मात्रा में रह गयी है। यदि अंग्रेज सैनिक किले में घुस गये तो आमने-सामने का युद्ध करना पड़ेगा और हम नहीं चाहते कि आप किसी संकट में पड़ें।

महारानी ने पूछा, ‘तो तुम्हारे पास क्या योजना है?’ झलकारी बाई तो यही प्रश्न चाहती थी। उसने कहा, ‘हम सब यह चाहते हैं आपको सुरक्षित बाहर निकलना चाहिये। अंग्रेजों को भ्रम में डालने के लिये पहले मैं आपके वेश में एक टुकड़ी लेकर निकलती हूँ। दुश्मन मेरा पीछा कर मुझे पकड़ने को दौड़ेंगे, तब तक आप दूसरी तरफ से किले से बाहर निकलकर सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना।’ महारानी को झलकारी की योजना उचित लगी और वह स्वयं भी बाहर निकलने की ही सोच रही थी। महारानी ने स्वीकृति दे दी।

अंग्रेज सेना झलकारी महारानी समझकर उसके पीछे दौड़ पड़ी। आखिर घेर कर झलकारी को गिरफ्तार कर लिया गया परन्तु तब तक महारानी लक्ष्मीबाई किले से बाहर जा चुकी थी झलकारी को देखकर एक अंग्रेज अफसर ने कहा, ‘मुझे तो ये पागल लगती है।” अंग्रेज जनरल रोज ने उत्तर दिया, ‘यदि भारत की एक प्रतिशत नारियाँ भी इस प्रकार पागल हो जाएं तो हमें भारत छोड़कर जाना पड़ेगा।’

झलकारी बाई अंग्रेजों की कैद से भी निकल भागी। अगले दिन अंग्रेजों ने किले पर भयंकर आक्रमण कर दिया। जनरल रोज ने देखा झलकारी किले की दीवार पर खड़ी एक तोपची की सहायता कर रही है। वह तोपची उसका पति पूरन सिंह था। तभी एक गोला पूरन सिंह को लगा और वह गिर पड़ा। उसको गिरा देख तुरन्त झलकारी ने तोप सम्भाल ली और शत्रुओं पर हमला करने लगी। उसके हमले से घबराकर अंग्रेजों ने तोपों से उस पर आक्रमण कर दिया। एक गोला झलकारी को जा लगा ‘जय भवानी’ कहते हुए वह भी अपने पति के पास गिर पड़ी। अपने राज्य अपनी आजादी के लिये अंतिम क्षण तक प्राण की बाजी लगाकर लड़ने वाली ऐसी थी वीरांगना झलकारी बाई

सुचेता कृपलानी

उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री श्रीमती सुचेता कृपलानी स्वतंत्रता सेनानी के साथ ही एक कुशल अध्यापिका भी रहीं। सुचेता का जन्म 25 जून 1908 ई. को पंजाब प्रांत के अम्बाला शहर में हुआ और प्रारम्भिक शिक्षा लाहौर में हुई तथा उच्चस्तरीय शिक्षा दिल्ली से पूरी हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय से संवैधानिक इतिहास विषय में एम.ए. करते ही इन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका पद पर नियुक्ति प्राप्त हुई। यहीं पर ये प्रो. जे. बी. कृपलानी के सम्पर्क में आईं। यही वह समय था जब इनके मन में देश सेवा का अंकुर पनपने लगा था। सन् 1932 ई. में सुचिता सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में आई और ई. में प्रो. जे.बी. कृपलानी के साथ विवाह के सूत्र में बंध गई। 1936

सन् 1939 ई. से इन्होंने देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरु कर दी। प्राध्यापिका का पद संभालते हुए प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में भाग लेना सम्भव नहीं था तो गुप्त रूप से देश की राजनीति में भाग लेने लगीं। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय तौर पर भाग लेने के लिये इन्होंने अपनी प्राध्यापिका की नौकरी छोड़ दी और कांग्रेस दल में शामिल हो गईं।

सन् 1940 ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह करने के कारण अंग्रेज सरकार ने सुचेता को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। सन् 1942 ई. में वे भूमिगत होकर युवा कार्यकर्ताओं का संचालन करने लगीं। सन् 1943 ई. में राष्ट्रीय कांग्रेस के अन्तर्गत इन्होंने महिला विभाग की स्थापना की। इस विभाग की कार्यवाहक मंत्री ये स्वयं बनीं। महिला विभाग का लक्ष्य महिलाओं में राजनीतिक चेतना जाग्रत करना था। महिला विभाग में स्त्रियों को लाठी चलाना, आत्मरक्षा के प्रयोग में आने वाले हथियार चलाना और प्राथमिक चिकित्सा कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसके साथ-साथ ये राजनीतिक कैदियों के परिवारों की सहायता की जिम्मेदारी भी उठाती थीं।

सन् 1942 ई. में भारत छोड़ो आंदोलन और नोआखली में गांधी जी के साथ कर पीड़ित महिलाओं की मदद की। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी सरकार ने सारे पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया तब सुचेता जी ने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाया।

आंदोलन कार्य संभालते हुए इन्हें अनेक मुसीबतें उठानी पड़ी लेकिन फिर भी सन् 1942 ई. से 1944 तक भूमिगत रहकर आंदोलन कार्य का संचालन करती रहीं, दो वर्ष बाद अंग्रेज सरकार इनको गिरफ्तार करने में कामयाब हो सकीं। 1945 ई. में ये जेल से रिहा हो पाई और फिर से समाज सेवा के कार्यों में जुट गईं।

1946 में ये संविधान सभा की सदस्या चुनी गई। सन् 1952 से 1957 तथा 1957 से 1962 तक ये दो बार लोकसभा के लिये सदस्य चुनी गईं। 1958 से 1960 तक कांग्रेस की महामंत्री रहीं। 1962 में वे कानपुर से विधानसभा की सदस्या चुनी गईं। 1963 से 1967 तक सुचेता उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनी। मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने जबूत इच्छाशक्ति के साथ हड़ताली कर्मचारियों को हड़ताल वापस लेने पर मजबूर किया। प्रशासनिक फैसले लेते समय वह दिल की नहीं दिमाग की सुनती थी।

1971 में सुचेता जी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। 1 दिसम्बर 1974 को इस जुझारू महिला ने अपनी जीवन यात्रा पूर्ण की। और अपने पीछे भारतीय नारी का अनुकरणीय व्यक्तित्व छोड़ गईं।

कैप्टन लक्ष्मी सहगल

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज की अधिकारी, आजाद हिन्द सरकार में महिला मामलों की मंत्री, आजाद हिन्द फौज की रानी झाँसी रेजिमेंट की कमाण्डर, पेशे से डॉक्टर लक्ष्मी स्वामीनाथन इतिहास में कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नाम से प्रसिद्ध हैं। लक्ष्मी का जन्म 24 अक्टूबर 1914 को मद्रास में एक तमिल परिवार में हुआ था। 1930 में पिता की मृत्यु का सामना करते हुए मद्रास से हाईस्कूल पास किया। 1932 में विज्ञान में स्नातक परीक्षा पास की। 1938 में एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की और स्त्री रोग व प्रसूति में विशेष योग्यता प्राप्त की। आपने चेन्नई के सरकारी डॉक्टर का काम किया। कस्तूरबा गांधी अस्पताल में, डॉक्टर का काम किया

लक्ष्मी ने पढ़ाई समाप्त करने के दो वर्ष बाद 1940 में सिंगापुर जाकर वहाँ गरीब भारतीय मजदूरों के लिये चिकित्सा शिविर लगाया। वहाँ न केवल भारतीय प्रवासी मजदूरों के लिये निशुल्क चिकित्सालय खोला- अपितु ‘भारत स्वतंत्रता संघ की सक्रिय सदस्या बनीं। वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अंग्रेजों ने सिंगापुर को जापानियों को समर्पित कर दिया तब आपने घायल युद्धबंदियों के लिये काफी काम किया। विदेश में मजदूरों की दशा और उन पर हो रहे जुल्मों को देखकर आपका दिल भर आया और निश्चय किया कि अपने देश की आजादी के लिये कुछ भी करेंगी।

2 जुलाई 1943 को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का सिंगापुर आना हुआ। लक्ष्मी ने सुभाष से भेंट की और उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुईं। लक्ष्मी ने देश की आजादी के लिये काम करने की इच्छा जतायी। आजादी की यह भावना देखकर नेताजी ने लक्ष्मी के नेतृत्व में रानी झाँसी रेजिमेंट बनाने की घोषणा कर दी। जिस जमाने में औरतों का घर से निकलना भी अपराध समझा जाता था, उस समय आपने 500 महिलाओं की एक फौज तैयार की 22 अक्टूबर 1943 को अपने रानी झाँसी रेजिमेंट में कैप्टन का पद संभाला। अपने साहस और अद्भुत कार्य की बदौलत आपको ‘कर्नल’ का पद भी मिला, जो एशिया में किसी महिला को पहली बार मिला था लेकिन लोगों ने आपको कैप्टन के रूप में ही याद रखा।

लक्ष्मी बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हो गई थीं और जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तो उसमें भाग लेकर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय सेना ने जापानी सेना के साथ मिलकर दिसम्बर 1944 में वर्मा के लिय आंदोलन किया। लेकिन युद्ध के दौरान मई 1945 में ब्रिटिश सेना ने आपको गिरफ्तार कर 4 मार्च 1946 तक वर्मा में ही रखा बाद में आपको रिहा कर भारत भेज दिया गया। रिहा होने के बाद सन् 1947 में आपने कर्नल प्रेम कुमार से लाहौर में विवाह किया और कानपुर में आकर बस गये। आपकी दो बेटियाँ सुभाषिनी और अनीसा हैं। सुभाषिनी ने फिल्मकार मुजफ्फर अली से विवाह किया। प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई आपकी सगी बहन हैं।

1971 में बांग्लादेश संकट के दौरान उन्होंने कलकत्ता में शरणार्थियों के लिए राहत शिविर का आयोजन किया। 1984 में भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1984 में ही सिख विरोधी दंगों के बाद शांति बहाली के लिए भी काम किया। बैंगलोर में विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता के विरुद्ध अभियान में, लक्ष्मी सहगल को गिरफ्तार भी किया गया।

स्वतंत्रता संग्राम में आपके संघर्ष एवं महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए आपको 1998 में पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया। 19 जुलाई 2012 को दिल का दौरान पड़ा तथा 25 जुलाई 2012 की सुबह 97 साल की उम्र में अपनी जीवन यात्रा पूर्ण की। आपके पार्थिव शरीर को कानपुर मेडिकल कॉलेज को मेडिकल रिसर्च के लिये दान में दे दिया गया। आपकी स्मृति में कानपुर में ‘कैप्टन लक्ष्मी सहगल इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ बनाया गया है।

भीकाजी कामा

अगस्त 1907 का तीसरा सप्ताह जर्मनी स्थित स्टुटगर्ट में अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन का आयोजन। विश्व के अनेक देशों के एक हजार प्रतिनिधि इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। भारत की बारी आने पर रंगीन साड़ी पहने श्रेष्ठता की आभा से दैदीप्यमान मुखमण्डल की स्वामिनी एक गरिमामयी युवती ने मंच पर पर्दापण किया जिसे देखते ही प्रतिनिधियों को लगा यह तो भारत की राजकन्या है। यह राजकन्या है- भीकाजी कामा वीर सावरकर की सहयोगी कामा, लंदन में दादाभाई नौरोजी की डेढ़ वर्ष तक निजी सचिव रही कामा, अंग्रेजी आदर्शों के अंधभक्त पति से वैचारिक लोहा लेने वाली कामा और जनसाधारण के बीच सर्वविदित मैडम कामा

साहस के साथ सम्मेलन में अपना प्रस्ताव रखते हुए कामा ने अंग्रेज सरकार को धिक्कारते हुए कहा कि वे प्रतिवर्ष भारत से साढ़े तीन करोड़ रुपया लूट रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था अंग्रेज साम्राज्यवादियों द्वारा हो रहे शोषण के कारण दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। भाषण के अंत में उन्होंने भारतीय झण्डा फहराते हुए कहा- ‘भारतीय स्वतन्त्रता का यह झण्डा है। देखो, यह आ गया है। जीवन का बलिदान करने वाले तरुणों के खून से यह पावन हुआ है। मैं आपको आवाहन करती हूँ, सज्जनों, उठो और भारतीय स्वतन्त्रता के इस झण्डे को प्रणाम करो। इस झण्डे के नाम पर मैं समस्त विश्व के स्वतंत्रता प्रेमियों से प्रार्थना करती हूँ कि इस झण्डे से वे सहयोग करें।’

मैडम कामा वह महिला थी जिसने विदेश की भूमि पर, अनेक देशों के प्रतिनिधियों के बीच भारत का झण्डा सर्वप्रथम फहराया। मैडम कामा वीर सावरकर और अन्य देशभक्तों ने मिलकर 1905 में तिरंगे का प्रारूप तैयार किया। सर्वप्रथम बर्लिन में और बाद में बंगाल में यह झण्डा फहराया गया।

इस झण्डे में तीन रंग के पट्टों-हरा, केसरी व लाल का समावेश था। सबसे ऊपर रे रंग के पट्टे में आठ खिलते हुए कमल अंकित थे। ये आठ कमल भारत के तत्कालीन आठ प्रदेशों के प्रतीक थे। बीच में केशरी पट्टे पर देवनागरी लिपि में वंदे मातरम् यह शब्द भारत माता के अभिवादन स्वरूप अंकित थे। सबसे नीचे लाल पट्टे में दाहिनी तरफ अर्धचंद्र एवं बायीं तरफ उगता सूरज चित्रित था। लाल रंग बल, केशरी रंग विजय और हरा रंग साहस तथा उत्साह के प्रतीक रूप दर्शाये गये थे।

जर्मनी के सम्मेलन के समापन के बाद कामा अमेरिका आई। भारत की आजादी के जिस पावन कार्य में वह लगी हुई थी। उसके लिये वहाँ के लोगों का समर्थन जुटाने हेतु अभियान शुरु किया। उन्होंने पत्रकारों और संवाददाताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारत के लाखों लोग अपढ़ और भूखे रहते हुए भी अपने देश से प्यार करते हैं। चंद वर्षों में ही भारतीय लोग आजादी हासिल करके रहेंगे और स्वतंत्रता, समता एवं बन्धुत्व के साथ जीतेंगे।

अपने देश के झण्डे तले बोलने की मेरी परिपाटी है। यह कहते हुए किसी भी समारोह में बोलने से पहले झण्डा फहराने वाली मैडम कामा ने देश को झण्डे का नेतृत्व दिया, पहचान दी। इस झण्डे को प्रणाम करो, कहकर विश्व में भारत की अस्मिता का सिर गर्व से ऊंचा किया। आजीवन भारत की स्वतंत्रता के स्वप्न को साकार करने के लिये प्रयासरत मैडम कामा का 13 अगस्त 1936 को देहान्त हो गया।

ऊदा देवी पासी

ऊदा देवी वह वीरांगना है जिसके बारे में भारतीय इतिहासकारों से ज्यादा अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने लिखा। लखनऊ के उजियारपुर गाँव में जन्मी ऊदा देवी का सम्बन्ध पासी जाति से था। कम उम्र में ही मक्का पासी नाम के युवक से विवाह होने पर अवध के ही एक करीबी गांव में ये दुल्हन बनकर पहुँच गई जहाँ इनका एक नया नामकरण हुआ- जगरानी।

सन् 1847 की फरवरी में लखनऊ के छठे नवाब वाजिद अली शाह ने बड़ी संख्या में अपनी सेना में सैनिकों की भर्ती की। ऊदा देवी के पति मक्का पासी जो काफी वीर, पराक्रमी और साहसी थे, सेना में भर्ती हो गये। कहते हैं पति को सेना में भर्ती होते देख ऊदा को भी प्रेरणा मिली और वह भी वाजिद अली शाह की सेना के महिला दस्ते में भर्ती हो गई। देशी रियासतों पर अंग्रेजों की बढ़ते हस्तक्षेप के मद्देनजर नवाब ने महल की रक्षा के उद्देश्य से स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता बनाया तो उसके एक सदस्य के रूप में ऊदा को भी नियुक्त किया गया।

10 मई 1857 को मेरठ के सैनिकों द्वारा छेड़ा गया स्वतंत्रता संघर्ष जब पूरे उत्तर भारत में तेजी से फैलने लगा तब लखनऊ के कस्बा चिनहट के निकट इस्माइलगंज में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज की मौलवी अहमदुल्लाह शाह की अगुवाई में संगठित क्रांतिकारी सेना से ऐतिहासिक लड़ाई हुई। जिसमें क्रांतिकारियों की विजय तथा हेनरी लारेंस की फौज को मैदान छोड़कर भाग खड़ा होना पड़ा परन्तु इस लड़ाई में मक्का पासी वीरगति को प्राप्त हो गये। ऊदा देवी ने पति के शव पर उनके बलिदान का बदला लेने की कसम खाई और अंग्रेजी सरकार के खिलाफ लड़ने का निश्चय किया।

ऊदा देवी की बहादुरी और तुरन्त निर्णय लेने की क्षमता से बेगम हजरत महल प्रभावित हुई और नियुक्ति के कुछ ही दिनों बाद में ऊदा देवी को बेगम की महिला सेना की टुकड़ी का कमांडर बना दिया गया। कमांडर के रूप में ऊदा ने देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस अदम्य साहस, दूरदर्शिता और शौर्य का परिचय दिया था, उससे खुद अंग्रेज सेना भी चकित रह गई थीं।

1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान हुई लखनऊ की घेराबंदी के समय, ब्रिटिश और औपनिवेशिक सैनिकों से घिरे सैकड़ों भारतीय सिपाहियों ने सिकन्दर बाग में शरण ली थीं 16 नवम्बर 1857 को ब्रिटिश फौजों ने कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में एक सोची-समझी रणनीति के तहत सिकन्दर बाग की तरफ विद्रोह को दबाने के लिये कूच किया। जहाँ भारतीय लड़ाके पहले से तैयार थे। ऊदा देवी के नेतृत्व में स्त्री सेना की टुकड़ी भी हमले के वक्त इसी बाग में मौजूद थी। हजारों भारतीय सैनिक अंग्रेजी सेना का मुकाबला करने के लिये आगे बढ़ रहे थे। ऐसे में ऊदा देवी और उनकी बटालियन ने ब्रिटिश सेना को सिकन्दर बाबा के द्वार पर ही रोक दिया।

इसी बाग में ऊदा देवी ने अपने युद्ध कौशल और दिलेरी से अंग्रेजों को भी हैरान कर दिया था। पुरुष वेश धारण किये पिस्तौल और गोलियों सहित ऊदा देवी अंग्रेज फौज को बाग में प्रवेश करने से पहले ही पीपल के पेड़ पर चढ़ गई थी। उन्होंने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकन्दर बाग में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया, जब तक कि उनका गोला बारुद समाप्त नहीं हो गया। पति के बलिदान का प्रतिशोध लेने का अवसर ऊदा को मिल चुका था। 36 से अधिक अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया था।

इधर तीस से ज्यादा सैनिकों की मृत्यु से अंग्रेजी सेना खोजने लगी कि आखिर गोलियाँ आ कहाँ से रही हैं। जब अंग्रेजों को पता चला कि पीपल के पेड़ के झुरमुट में छिपकर कोई ऊपर से गोलियाँ चला रहा है तो अंग्रेजों ने पीपल के पेड़ को घेर कर गोलियाँ चलानी शुरु कर दी। ऊदा देवी पेड़ से उतर ही रही थी कि अंग्रेजों ने उन पर गोलियों की बौछार कर छलनी कर दिया। इस प्रकार उस शेरनी ने 36 अंग्रेज सैनिकों को मारकर अपने पति की मृत्यु का बदला लिया और वीरगति को प्राप्त हो गयी।

भगिनी निवेदिता

स्वामी विवेकानन्द की मानस पुत्री भगिनी वास्तविक नाम मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल था। उनका जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैण्ड में हुआ था। 1896 में शिकागों में स्वामी जी के व्याख्यान सुनकर मार्गरेट को लगा कि जिस धर्म और दर्शन की उन्हें पिछले कई वर्षों से निरन्तर खोज थी, वह मिल गया।

स्वामी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मारिट भारत आई और भारत की ही होकर रह गईं। स्वामी जी की इच्छानुसार माँ सारदामणि के आश्रम में रामकृष्ण बालिका विद्यालय की स्थापना की गई। उनके विद्यालय में हिन्दुत्व और भारतीयता के ही संस्कार दिये जाते थे। भारत के प्रति इस समर्पण को देखते हुए ही स्वामी जी ने उन्हें नाम दिया- निवेदिता निवेदिता अर्थात् समर्पिता। निवेदिता ने एक बार स्वामी जी से पूछा कि वे भारत की सबसे अच्छी सेवा कैसे कर सकती हैं तो स्वामी जी का उत्तर था भारत को प्यार करके।

अरविन्द घोष को प्रवक्ता से क्रांतिकारी बनने तथा बंग-भंग आंदोलन के शूरवीर के रूप में प्रकट करने में निवेदिता का योगदान अतुलनीय है। नौकरी से त्यागपत्र देकर वे बंगाल पहुँचकर पूरी शक्ति से आंदोलन में जुट गए। जब अरविन्द बंदी बना लिये गये और समाचार पत्रों पर भी प्रतिबंध लग गया। तब कर्मयोगिनी निवेदिता ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अनेक नवीन समाचार पत्रों का श्रीगणेश कर सम्पादन भी अज्ञात नामों से किया।

भारतीय संस्कृति को अपनी आत्मा में विलय करने वाली निवेदिता एक दिन गुरुदेव टैगोर के घर गईं। उन्हें देखकर गुरुदेव ने अनुमान लगाया कि कोई अंग्रेजी मेम घर पर बालकों का ट्यूटर बनना चाहती है। अतः वे बोले- मिस निवेदिता, आप मेरी छोटी बच्ची को अंग्रेजी पढ़ा दिया करें। इस पर निवेदिता ने तीखेपन से उनसे पूछा- क्या आप उसे मैडम बनाना चाहते हैं? उसे श्रेष्ठ भारतीय नारी ही बनने दीजिये। अपरिपक्व अवस्था में अंग्रेजी पढ़ाकर उसको न बिगाड़ें।

ऐसे ही एक बार विजयदशमी के अवसर पर नागपुर के एक महाविद्यालय के क्रिकेट खिलाड़ियों ने निवेदिता जी को पुरस्कार वितरण के लिये आमंत्रित किया। वे वहाँ गई और अपने भाषण में कहा- क्रिकेट जैसे विदेशी खेलों में निपुणता पाने की अपेक्षा राष्ट्रीय खेलों में प्रवीण होना अधिक महत्वपूर्ण है। दुर्गा पूजा के अवसर पर आपको माँ दुर्गा और खड्ग पूजन का विस्मरण हो गया, यह आश्चर्य की बात है। भोंसलों की राजधानी में ऐसा होना क्या हमें शोभा देता है? विदेशी रंग में रंगते जा रहे भारतीय युवकों को भी खींचकर स्वदेशी का संदेश देने वाली निवेदिता सम्पूर्ण हृदय से भारतीय थीं।

भारतीय कला की अनुभूति निवेदिता जी को बहुत गहरी थी। इसलिये उन्होंने पाश्चात्य व भारतीय कला में अन्तर को स्पष्ट करते हुए कहा था- “कला का सम्बन्ध भावना से तथा भावना का संस्कारों से एवं संस्कारों का सम्बन्ध संस्कृति से होता है। इसी कारण पाश्चात्य जगत में संगीत, चित्रकारिता, नृत्य और स्थापत्य कला में महत्व मनोरंजन को दिया जाता है। परन्तु भारतीय जीवन रचना में महत्व भक्ति को है, चाहे वह परमेश्वर के प्रति हो, समाज के प्रति या परिवार के प्रति हो। अतः भारतीय कला में चाहे वह नृत्य हो, संगीत हो, या स्थापत्य कला, उसके पीछे भाव भक्ति ही रहा है।

एक दिन निवेदिता जी ने अवनीन्द्रनाथ ठाकुर (गुरुदेव के भाई) से आग्रह किया कि वे भारत माता का एक भव्य चित्र बनावें। ठाकुर बोले ‘जिसको देखा ही नहीं, उसका चित्रांकन कैसे होगा? निवेदिता बोल उठी, ‘यह विषय भक्ति का है। भारत यह कंकड़-पत्थर का ढेर नहीं यह तो जगद्जननी माता है। सारा समाज उसी की संतान है। उस पुनीत माँ का स्मरण करो, चित्र चमक उठेगा।’ भाव विभोर अवनीन्द्र बाबू ने एक भव्य चित्र तैयार किया। उसे देखकर निवेदिता बोल उठी ‘इस चित्र में हमें वह हर चीज मिलती है जिसके लिये भारतीय कला वर्षों से प्रतीक्षा कर रही है।

निवेदिता के इसी भारतीय स्वरूप को प्रणाम करते हुए क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने कहा विवेकानन्द की लाडली कन्या, अनुशीलन समिति की जॉन ऑफ आर्क, अरविन्द घोष की क्रांतिकारी सहकारिणी, भारत की सूखी हड्डियों में स्पन्दन उत्पन्न करने वाली निवेदिता।

राजमोहिनी देवी

सन् 1948-50 के बीच मध्य प्रदेश के सरगुजा जिले में भारी अकाल पड़ा। इतना भीषण अकाल कि आदिवासी जीवन का आधार कहे जाने वाले कंदमूल भी इस बार उपलब्ध नहीं थे। सात बच्चों की माँ मजदूरिन राजमनिया सुदूर जंगल में जाकर शाम तक इतना भी कंद नहीं जुटा पाई थी कि अपने बच्चों का पेट भर सके। इसीलिये वह परेशान थी और रो रही थी।

ठीक उसी समय उसे वहाँ एक महात्मा दिखाई दिये। राजमनिया उन्हें देखते ही उनकी ओर दौड़ी और उनके पैरों में गिरकर अपना दुख सुनाने लगी। महात्मा ने उसे धीरज बंधाते हुए बोले- बेटी सरगुजा के लोग पैदा करने वाले भगवान की पूजा नहीं करते। उनके मन में जंगल के जीवों के लिये कोई दया नहीं है। ईश्वर के दिये अनाज को सड़ाते, बिगाड़ते हैं। इसलिये भगवान का उन पर कोप है।’ राजमनिया को जब यह बात समझ में नहीं आई तो महात्मा जी ने उसे सरल तरीके से समझाया कि लोगों को मांस नहीं खाना चाहिये। महुआ और चावल जैसी अच्छी चीजों को सड़ाकर शराब नहीं बनानी चाहिये क्योंकि मांस और शराब बुद्धि को भ्रष्टकर देते हैं। ये सब छोड़कर अपना घर-आंगन साफ सुथरा रखें। प्रतिदिन स्नान करके भगवान की पूजा करें और बाद में भोजन करें तो सब संकट दूर हो जायेंगे। इस घटना ने राजमनिया को चकाचौंध कर दिया। उस के में महात्मा जी के शब्द घर कर गये। उसके मन में एक अजीब हृदय उत्साह भर गयी।

घर पहुंचते ही राजमनिया शराब और माँस के मटके बाहर फेंके। घर को लीप-पोत कर स्वच्छ किया। उसके भीतर एक विचित्र सी ज्वाला जल रही थी। रात के समय चुपचाप बैठकर आकाश की ओर देखती रही। घर और गांव के लोग उसे अजीब तरह से देख रहे थे। दो दिन तक लगातार यही होता रहा। तीसरे दिन वह घर से निकलकर सामने की चट्टान पर बैठ गई और महात्मा जी का संदेश सुनाने लगी। लोग तो उसे पागल समझ ही रहे थे लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी थे जो उसकी बात से प्रभावित होकर घरों में गंदगी बाहर निकालने लगे। लेकिन जिन्हें उसकी बात जंच नहीं रही थी, उनमें गाँव का मुखिया भी था, उन्होंने उसे डाँटा-धमकाया पर राजमनिया पर कोई असर नहीं हुआ। वह तो वैसे ही पागल की तरह अपनी बात लोगों को सुनाती रहीं।

दो-चार दिन ही गुजरे थे कि अचानक आकाश से बूंदे टपकने लगी। यह चमत्कार देखकर लोग प्रभावित हुए। धीरे-धीरे राजमनिया की बातें लोगों को समझ आने लगी। प्रभाव बढ़ता गया और थोड़े ही दिनों में वह राजमनिया से राजमोहिनी देवी हो गई। आदिवासी जनता राम-नाम को जानती तक नहीं थी लेकिन अब उन्हें राम-नाम और भजन सब अच्छे लगने लगे थे। लोग हजारों की संख्या में उसके दर्शन को आने लगे। मांसाहार, शराब छोड़ना, घर-आंगन साफ रखना, प्रतिदिन नहाना, भगवान की पूजा करके भोजन करना यह था राजमोहिनी देवी का उपदेश इन बातों को मानकर इसकी दीक्षा लेना-इसको वहाँ सुराज कहते हैं।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सीमावर्ती छह जिलों में सुराज का प्रचार हुआ और वहाँ के आदिवासियों को इससे नवजीवन मिला उन्हें जीने का एक सुन्दर तरीका प्राप्त हुआ। यही सुराज आंदोलन आगे चलकर बापू धर्म सभा आदिवासी सेवा मण्डल बना। राजमोहिनी ने अब सुराज के प्रचार-प्रसार के लिये पद यात्राएं शुरू की और शिविर सम्मेलन भी करने शुरू किये। उनकी यात्राएं और शिविर सम्मेलनों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कम नहीं होती। 1952 में राजमोहिनी ने गृह त्याग कर दिया और जिस चट्टान पर प्रथम बार बैठी थी, उसी चट्टान पर अपने लिये कुटिया बनाई।

राजमोहिनी देवी का भोला-भोला चेहरा, रुखे-सूखे बाल, हाथों में चांदी के कंगन, बदन पर मोटी खादी की धोती, काला सांवला रंग-साधारण व्यक्तित्व परन्तु असाधारण कृतित्व, जो आज आदिवासियों के लिये नेता ही नहीं, देवता भी बनी हुई है। भारत सरकार ने 1989 में राजमोहिनी देवी को पदमश्री से सम्मानित किया।

लक्ष्मीबाई केलकर

सेवा ग्राम में सायं प्रार्थना के समय महात्मा गांधी का प्रवचन चल रहा था, ‘अपने भारत की महिमा तभी बढ़ेगी जब यहाँ की सभी स्त्री सीता बनेंगी। प्रत्येक भारतीय स्त्री सीता बनेगी तो इस देश का चित्र बदल जायेगा।’ उस सभा में एक युवती ने खड़े होकर बापू से प्रश्न किया, ‘बापू जी आप हमें सीता बनने के लिये कह रहे हैं, तो पुरुषों को भी राम बनने के लिये क्यों नहीं कहते? गांधी जी की सभा में नारी समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए निर्भीक होकर प्रश्न पूछने वाली यह युवती थी, नारी जागरण एवं संगठन के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका लक्ष्मीबाई केलकर लक्ष्मीबाई का जन्म 6 जुलाई 1905 को नागपुर के दाते परिवार में हुआ। बालिका का नाम कमल रखा गया।

कमल के घर में देशभक्ति का वातावरण था। उसकी माँ जब लोकमान्य तिलक का अखबार ‘केसरी’ पढ़ती थीं, तो कमल भी गौर से उसे सुनती थी। केसरी के तेजस्वी विचारों से प्रभावित होकर उसने निश्चय किया कि वह बिना दहेज विवाह करेगी। इस जिद के कारण उसका विवाह 14 वर्ष की आयु की अवस्था में वर्धा के एक विधुर वकील पुरुषोत्तमराव केलकर से हुआ, जो दो पुत्रियों के पिता थे। विवाह के बाद उसका नाम लक्ष्मीबाई केलकर हो गया।

लक्ष्मीबाई ने छह पुत्रों को जन्म दिया। वह एक आदर्श व जागरुक गृहिणी थीं। मायके से प्राप्त संस्कारों का उन्होंने गृहस्थ जीवन में पूर्णतः पालन किया। उनके घर में स्वदेशी वस्तुएँ ही आती थीं। अपनी कन्याओं के लिये वे घर पर एक शिक्षक बुलाती थीं। वहीं से उनके मन में कन्या शिक्षा की भावना जन्मी और उन्होंने एक बालिका विद्यालय खोल दिया। रूढ़िग्रस्त समाज के विरुद्ध जाकर उन्होंने घर में हरिजन नौकर रखे। गांधी जी की प्रेरणा से उन्होंने घर में चरखा मंगाया। एक बार जब गांधी जी ने एक सभा में दान की अपील की, तोलक्ष्मीबाई ने अपनी सोने की जंजीर ही दान कर दी।

1932 में उनके पति का देहान्त हो गया। अब अपने बच्चों के साथ बाल विधवा ननद का दायित्व भी उन पर आ गया। लक्ष्मीबाई ने घर के दो कमरे किराये पर उठा दिये। इससे आर्थिक समस्या कुछ हल हुई। इन्हीं दिनों उनके बेटों ने संघ की शाखा पर जाना शुरु किया। उनके विचार और व्यवहार में आये परिवर्तन से लक्ष्मीबाई के मन में संघ के प्रति आकर्षण जगा और उन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से भेंट की और उनकी प्रेरणा से उन्होंने 1936 में स्त्रियों के लिये ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नामक एक नया संगठन प्रारम्भ किया। समिति के कार्य विस्तार के साथ ही लक्ष्मीबाई ने नारियों के हृदय में श्रद्धा का स्थान बना लिया। सब उन्हें वन्दनीया मौसीजी कहने लगे। उनके निरन्तर प्रवास से समिति के कार्य का अनेक प्रांतों में विस्तार हुआ।

1945 में समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। देश की स्वतंत्रता एवं विभाजन से एक दिन पूर्व वे कराची, सिंध में थीं। उन्होंने सेविकाओं से हर परिस्थिति का मुकाबला करने और अपनी पवित्रता बनाये रखने को कहा। उन्होंने हिन्दू परिवारों के सुरक्षित भारत पहुँचने के प्रबंध भी किये।

मौसीजी स्त्रियों के लिये जीजाबाई के मातृत्व, अहल्याबाई के कर्तृत्व तथा लक्ष्मीबाई के नेतृत्व को आदर्श मानती थीं। उन्होंने अपने जीवनकाल में बाल मंदिर, भजन मण्डली, योगाभ्यास केन्द्र, बालिका छात्रावास आदि अनेक प्रकल्प प्रारम्भ किये। वे रामायण पर बहुत सुन्दर प्रवचन देती थीं। उनसे होने वाली आय से उन्होंने अनेक स्थानों पर समिति के कार्यालय बनवाये।

27 नवम्बर, 1978 को नारी जागरण की अग्रदूत वंदनीय मौसीजी का देहान्त हुआ। उनके द्वारा स्थापित राष्ट्र सेविका समिति आज भारत ही नहीं विश्व के भी अनेक देशों में सक्रिय हैं।

माँ अमृतानन्दमयी

आज जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में माँ अमृतानन्दमयी के नाम से जाना जाता है, उनका जन्म 27 सितम्बर 1953 को केरल के समुद्र तट पर स्थित आलप्पाड ग्राम के एक अति निर्धन मछुआरे परिवार में हुआ। वे अपने पिता की चौथी सन्तान हैं। बचपन में उनका नाम सुधामणि था। जब वे कक्षा चार में थीं, तब उनकी माँ बहुत बीमार हो गयीं। उनकी सेवा में सुधामणि का अधिकांश समय बीतता था। अतः उसके बाद की उसकी पढ़ाई छूट गयी।

सुधामणि को बचपन से ही ध्यान एवं पूजन में बहुत आनन्द आता था। माँ की सेवा से जो समय शेष बचता, वह इसी में लगता था। पाँच वर्ष की अवस्था से ही वह कृष्ण-कृष्ण बोलने लगी थी। इस कारण उन्हें मीरा और राधा का अवतार मानकर लोग श्रद्धा व्यक्त करने लगे।

माँ के देहान्त के बाद सुधामणि की दशा अजीब हो गयी। वह अचानक खेलते खेलते योगियों की भाँति ध्यानस्थ हो जाती। लोगों ने समझा कि माँ की मृत्यु का आघात न सहन कर पाने के कारण उसकी मानसिक दशा बिगड़ गयी है। अतः उसे वन में निर्वासित कर दिया गया। पर वन में सुधा ने पशु-पक्षियों को अपना मित्र बना लिया। वे ही उसके लिए खाने-पीने की व्यवस्था करते। एक गाय उसे दूध पिला देती, तो पक्षी फल ले आते। यहाँ सुधा ने प्रकृति के साथ समन्वय का पाठ सीखा कि प्रकृति का रक्षण करने पर वह भी हमें संरक्षण देगी। धीरे-धीरे उसके विचारों की सुगन्ध चारों ओर फैल गयीं लोग उन्हें अम्मा या माँ अमृतानन्दमयी कहने लगे।

जब कोई भी दुखी व्यक्ति उनके पास आता, तो वे उसे गले से लगा लेतीं। इस प्रकार वे उसके कष्ट लेकर अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार उसमें कर देती हैं। इससे वह हल्कापन एवं निरोगी अनुभव करता है। हजारों लोगों को हर दिन गले लगाने के कारण उन्हें गले लगाने वाली संत कहने लगे हैं। एक पत्रकार ने उनसे गले लगाना का रहस्य पूछा- ‘तो वे हँसकर बोली- माँ अपने बच्चों को गले ही लगाती है। इसी से बच्चे के अधिकांश रोग-शोक एवं भय मिट जाते हैं। उसने फिर पूछा यदि आपको दुनिया का शासक बना दिया जाये, तो आप क्या करना पसन्द करेंगी। अम्मा का उत्तर था मैं झाडू लगाने वाली बनना पसन्द करुँगी, क्योंकि लोगों के दिमाग में बहुत कचरा जमा हो गया है। वह पत्रकार देखता रहा गया है।

अम्मा ने निर्धनों के लिए हजारों सेवा कार्य चलाये हैं। इनमें आवास, गुरुकुल, विधवाओं को जीवनवृत्ति, मुफ्त भोजन योजना, अस्पताल एवं हर प्रकार के विद्यालय हैं। गुजरात के भूकम्प और सुनामी आपदा के समय अम्मा ने अनेक गाँवों को गोद लेकर उनका पुनर्निर्माण किया। यद्यपि अम्मा केवल मलयालम भाषा जानती हैं, पर सारे विश्व में उनके भक्त हैं। वे उन सबको अपनी सन्तान मानती हैं। जब 2003 में उनका 50वाँ जन्मदिवस मनाया गया, तो उसमें 192 देशों से भक्त आये थे। इनमें शीर्ष वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, पर्यावरणविद, मानवाधिकारवादी सब थे। वे अम्मा को धरती पर ईश्वर का वरदान मानते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने कार्यक्रमों में तीन बार अतिविशिष्ट वक्ता के रूप में उनका सम्मान किया हैं। शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में उनकी अमृतवाणी से सारे धर्माचार्य अभिभूत हो उठे थे। अम्मा का उनके सेवा कार्यों के लिए देश विदेश के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 2002 में अहिंसा एवं शांति के क्षेत्र कार्य करने के लिए जिनेवा में “गाँधी-किंग पुरस्कार” से भी सम्मानित किया गया।

सावित्रीबाई फुले

भारत की प्रथम महिला शिक्षिका एवं मराठी काव्य की दूताबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में नामगाँव नामक छोटे को गाँव में एक किसान परिवार में हुआ 9 वर्ष की आयु में सावित्री का विवाह 12 वर्ष के ज्योतिराव गोविन्द राव फुले से कर दिया गया। उनकी कोई स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी और तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। सावित्री जब छोटी थीं तब एक बार किसी किताब के पन्ने पलट रही थी तो इनके पिता ने किताब छीनकर फेंक दी क्योंकि उस समय दलित और महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था सावित्री उस फेंकी हुई पुस्तक को चुपचाप उठाकर लाई ओर निश्चय किया कि यह एक दिन पढ़ना अवश्य सीखेगी।

सावित्री ने जो सपना पाला था उसी को पूरा करने के लिये ईश्वर ने ज्योतिराव जैसे व्यक्ति को इनका पति बनाकर भेज दिया। ज्योतिराव खेत में काम करते थे और सावित्री जब उन्हें खाना देने खेत में आती थी, उस दौरान वे सावित्री को पढ़ाते थे घर-बाहर सबका विरोध झेलते हुए भी ज्योतिराव ने उनका दाखिला एक प्रशिक्षण विद्यालय में कराया दिया जहाँ सावित्री ने अपना अध्ययन पूरा किया।

नारी शिक्षा की आवश्यकता को जानकर 1848 में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की 9 छात्राओं के साथ बालिका विद्यालय की स्थापना की। स्कूल खोलने पर लड़कियों को पढ़ाने के लिये कोई अध्यापिका न मिली तो स्वयं को उस योग्य बनाया और अध्यापन कार्य किया। वे भारत के प्रथम बालिका विद्यालय की प्रथम महिला शिक्षिका और प्रथम किसान स्कूल की संस्थापिका बनीं।

1852 में अछूत बालिकाओं के लिये विद्यालय की स्थापना की। स्त्री शिक्षा को समाज विरोधी मानने वाले लोगों द्वारा भयंकर विरोध किया गया। स्कूल जाते समय सावित्री पर पत्थर और गंदगी फेंकी जाती थी। दृढनिश्चयी सावित्री थैले में एक साड़ी लेकर चलती थी जिसे स्कूल में जाकर बदल लेती थी।

सावित्रीबाई ने 1852 में एक ‘महिला मण्डल’ का गठन किया और भारतीय महिला आंदोलन की प्रथम अगुवा भी बनीं। 28 जनवरी 1853 को बाल हत्या प्रतिबंध गृह की स्थापना की जहाँ विधवायें और गर्भवती, शोषित, पीड़ित अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं और बच्चों को इस गृह में रखकर भी जा सकती थीं। इस गृह की पूरी देखभाल व बच्चों का पालन-पोषण सावित्रीबाई स्वयं ही करती थी। 1855 में मजदूरों को शिक्षित करने के उद्देश्य से ‘रात्रि पाठशाला’ खोली। उस समय विधवाओं के सिर को जबर्दस्ती मुंडवा दिया जाता था। सावित्री बाई ने इस अत्याचार का विरोध किया और नाइयों से सम्पर्क कर समझाया। इसी के चलते 1860 में नाइयों ने हड़ताल कर कहा कि वे किसी विधवा का सिर गंजा नहीं करेंगे, ये हड़ताल सफल रहीं। और एक कुप्रथा का अंत भी हो गया।

24 सितम्बर 1873 को ज्योतिबा के साथ मिलकर सावित्री बाई ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। विधवा विवाह की परम्परा शुरू की गई। फुले दम्पत्ति के कोई संतान नहीं थी और इन्होंने एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र गोद ले लिया। इसका फुले परिवार में तीखा विरोध हुआ और पिता पर दबाव डालकर पति-पत्नी को घर से निकलवा दिया गया। इससे कुछ समय के लिये उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक तीन बालिका स्कूल खोल दिये।

महाराष्ट्र में 1876 व 1896 में दो बड़े अकाल एवं 1897 में पुणे में फैले प्लेग के समय सावित्री ने पीड़ितों के बीच में जाकर राहत कार्य किये। प्लेग से पीड़ित एक छोटे बच्चे को अस्पताल ले जाते समय प्लेग ने इन्हें भी घेर लिया और 10 मार्च 1897 को इनका निधन हो गया। सावित्री बाई को महिला शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिये 16 नवम्बर, 1852 में अंग्रेज सरकार ने शॉल भेंटकर सम्मानित किया। केन्द्र और महाराष्ट्र सरकार ने सावित्रीबाई की स्मृति में कुछ पुरस्कारों की भी स्थापना की है। इनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया है।

श्रीमाँ

सन् 1962 का भारत-चीन युद्ध भारत के लिये बहुत बड़ा सवाल था। उस समय एक आध्यात्मिक शक्ति ने इस विकट घड़ी में अपनी सूक्ष्म सत्ता के साथ भारत की सीमा पर भीषण लड़ाई के बीच उपस्थित रहकर अपनी दिव्य शक्ति भारतीय सैनिकों की सहायता की जिसमें फलस्वरूप युद्ध विराम हो गया।

भारतीय सैनिकों को सरहद पर सुरक्षा कवच पहनाने वाली इस दिव्यात्मा का नाम है- मीरा अल्फांसा, जिन्हें हम सब श्रीमाँ के नाम से पहचानते हैं। 21 फरवरी, 1878 को पेरिस में जन्मी मीरा अल्फांसा के पूर्वज मिस्र के थें मीरा पाँच वर्ष की आयु से ही योग के प्रति सचेतन हो गयी थी। उनके बचपन के कई प्रसंगों से उनके आत्मविश्वास, दृढ़ता और नैतिक साहस का परिचय मिलता है। वे बचपन से ही जानती थी कि उनके भीतर एक असाधारण शक्ति काम कर रही हैं। किशोरी मीरा पढ़ने-लिखने में प्रवीण थी। उसने संगीत में गाना-बजाना दोनों सीखा। पढ़ाई खत्म होते ही उन्होंने चित्रकारी सीखी, आज भी उनके चित्र यूरोपीय कला के अद्भुत नमूनों के रूप में देखे जा सकते हैं। अपनी किशोरावस्था में ही जब वह देह की दृष्टि से सोयी होती थी तो अनेक गुरु और ज्ञानी आकर उन्हें गुह्य ज्ञान बोध दिया करते थे। यही गुह्य विद्या उन्होंने अलजीरिया में रहकर सीखी।

उस समय तक वे भारतीय धर्म और दर्शन से बहुत कम परिचित हो पाई थी तो भी उस विशेष आत्म सत्ता को जिसे वे आप ही आप भीतर से अपना कृष्ण कहने लगी थीं और यह भी समझने लगी थी कि एक दिन उसके साथ भेंट होगी और उसी के साथ भागवत कार्य भी करना है। 29 मार्च 1914 को 36 वर्ष की आयु में जब वे पहली बार श्री अरविन्द से मिलीं तो पहली ही दृष्टि में उन्होंने पहचान लिया कि जो एक महासत्ता उसकी साधना को निरन्तर दिशा दिखाती आई और जिसे वह अपना कृष्ण कहकर पुकारती रही है वह यही है। वास्तव में श्री अरविन्द की साधना और उनका कार्य अभी तक किसी महान् व्यक्ति के आगमन की प्रतीक्षा में अटका था। जिसे उनका यथार्थ सहयोगी होना था। श्रीमाँ का मानना था कि मैं जनम से भले ही पेरिस की हूँ, पर अन्तरात्मा और मन की अभिरुचियों से भारत की ही हूँ। प्रेयर्स एण्ड मेडिटेशन शीर्षक से श्रीमाँ की जो डायरी प्रकाशित हुई है उसमें उनकी साधना के स्वरूप और धरती पर जन्म लेने के वास्तविक उद्देश्य का पता चलता है। 15 अगस्त 1914 को श्री अरविन्द के 42वें जन्मदिन पर उनके और श्रीमाँ के सहयोग से आर्य नामक एक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया। आर्य का फ्रेंच भाषा में अनुवाद भी पांडिचेरी से प्रकाशित किया गया। 21 फरवरी 1915 को श्रीमाँ का प्रथम बार पांडिचेरी में जन्मदिन मनाया गया किन्तु प्रथम विश्व युद्ध के कारण वह 22 फरवरी को वापिस फ्राँस चली गई। सन् 1915-16 के बीच श्री अरविन्द और श्रीमाँ में अपने सम्मिलित ध्येय, अपने आध्यात्मिक अनुभव और मानवता के लिये किये जाने वाले कार्य में जो कठिनाई आ रही थी उस अविचलित विश्वास और अन्तिम विजय के सम्बन्ध में पत्र व्यवहार होता रहा।

फ्राँस से सन् 1916 में वे जापान गई और वहाँ चार वर्ष रहीं। सन् 1919 में गुरुदेव टैगोर उनसे जापान में मिले। गुरुदेव ने उनसे शांति निकेतन का कार्यभार संभालने के लिये अनुरोध किया। पर वे जानती थी कि उनका भाविक कार्य तो श्री अरविन्द के साथ रहकर होना है। इसलिये सहमत नहीं हुई। 24 अप्रैल, 1920 को श्रीमाँ अन्तिम रूप से पांडिचेरी आई और तभी श्री अरविन्द आश्रम की पांडिचेरी में स्थापना की गई। 1922 से आश्रम की सारी व्यवस्था अपने हाथों में लेकर श्री अरविन्द के अनुयायियों की श्रीमाँ बन गई। श्री अरविन्द आश्रम श्रीमाँ को अपनी सृष्टि है, वे बचपन से ही स्वप्न देखा करती थीं कि पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह हो जहाँ व्यक्ति जीवनयापन की सारी व्यवस्थाओं से सर्वथा विमुक्त रहकर अपनी समग्र शक्तियों का अनुवेशन करे। भगवान को पाने के लिये अपनी सारी शक्ति, सारा ध्यान लगा दे।

श्रीमाँ ने अब अपना सारा ध्यान श्री अरविन्द आश्रम व उसके साधकों के योग की साधना की ओर प्रवृत्त कर दिया। सन् 1950 में श्री अरविन्द के देह त्याग के पश्चात् 1952 में श्री अरविन्द अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र का उद्घाटन 1968 में आरोविल के निर्माण के पश्चात् 17 नवम्बर 1973 को श्रीमाँ ने देह त्याग किया और 19 नवम्बर को उनके शरीर को समाधिस्थ किया गया।

अमृता देवी

प्रतिवर्ष 5 जून को हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। लेकिन यह दिन हमारे मन में सच्ची प्रेरणा नहीं जगा पाता। क्योंकि इसके साथ इतिहास की कोई प्रेरक घटना नहीं जुड़ी है। दूसरी ओर भारत के इतिहास में सितम्बर 1730 को एक ऐसी घटना घटी है, जिसकी विश्व में कोई तुलना नहीं की जा सकती।

• राजस्थान तथा भारत के अनेक क्षेत्रों में विश्नोई समुदाय के लोग रहते हैं। उनके गुरु जम्भेश्वर जी ने अपने अनुयायियों को हरे पेड़ न काटने, पशु-पक्षियों को न मारने तथा जल गन्दा न करने जैसे 29 नियम दिये थे। इन बीस+नौ नियमों के कारण उनके शिष्य बीस नौई अर्थात् विश्नोई कहलाते हैं। पर्यावरण प्रेमी होने के कारण इनके गाँवों में पशु-पक्षी निडर होकर घूमते हैं। 1730 में पर्यावरण रक्षा के लिये बलिदान की एक ऐसी घटना घटी जिसने इन पर्यावरण प्रेमियों को विश्व इतिहास में अमर कर दिया।

1730 ई. में जोधपुर नरेश अजय सिंह को अपने महल के निर्माण कार्य में चूना पकाने के लिए ईंधन की आवश्यकता पड़ी। उनके आदेश पर सैनिकों के साथ सैकड़ों लकड़हारे पास के गाँव खेजड़ली में शमी वृक्षों को काटने चल दिये। जैसे ही यह समाचार उस क्षेत्र में रहने वाले विश्नोइयों को मिला, उन्होंने इसका जमकर विरोध किया। जब सैनिक नहीं माने, तो एक साहसी महिला इमरती देवी के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामवासी, जिनमें बच्चे और बड़े, स्त्री और पुरुष सब शामिल थे, पेड़ों से लिपट गये। उन्होंने सैनिकों को बता दिया कि उनकी देह के कटने के बाद ही कोई हरा पेड़ कट पायेगा।

सैनिकों पर भला इन बातों का क्या असर होना था ? वे राजा के आदेश से बँधे थे, तो ग्रामवासी भी अपने धर्म पर अडिग थे। अतः वृक्षों के साथ ही ग्रामवासियों के अंग भी कटकर धरती पर गिरने लगे। सबसे पहले वीरांगना इमरती देवी पर ही कुल्हाड़ियों के निर्मम प्रहार हुए और वृक्ष-रक्षा के लिए प्राण देने वाली इमरती देवी विश्व के इतिहास में अमृता देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। इस बलिदान से उत्साहित ग्रामवासी पूरी ताकत से पेड़ों से चिपक गये।

1730 की भाद्रप्रद शुक्ल दशमी को प्रारम्भ हुआ यह बलिदान-पर्व 27 दिन तक चलता रहा। इस दौरान 363 लोगों ने बलिदान दिया। इनमें अमृता देवी की तीनों पुत्रियों सहित 69 महिलाएँ भी थीं। अन्ततः राजा ने स्वयं आकर क्षमा माँगी और हरे पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध लगा दिया।

उस ऐतिहासिक घटना की याद में आज भी वहाँ भाद्रपद शुक्ल 10 को बड़ा मेला लगता है। राजस्थान शासन ने वन, वन्य जीव तथा पर्यावरण रक्षा हेतु “अमृता देवी विश्नोई स्मृति पुरस्कार’ तथा केन्द्र सरकार ने अमृता देवी विश्नोई पुरस्कार देना प्रारम्भ किया है। यह बलिदान विश्व इतिहास की अनुपम घटना है। इसलिए भाद्रपद शुक्ल 10 वास्तविक विश्व पर्यावरण दिवस होने योग्य है। 20वीं शती में गढ़वाल (उत्तरांचल) में गौरा देवी, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा सुन्दरलाल बहुगुणा ने वृक्षों के संरक्षण के लिए ‘चिपको आंदोलन’ चलाया, उनकी प्रेरणास्त्रोत भी अमृता देवी ही थीं।

सरोजिनी नायडू

लिये बाँसुरी हाथों में हम घूमें गाते-गाते मनुष्य सब हैं बंधु हमारे, जग सारा अपना हैं।

विश्व बन्धुत्व के इस भाव को अपने कविता में सार्थक करने वाली सरोजिनी नायडू एक सच्ची देशभक्त और विशुद्ध भारतीय महिला थीं। उनका मानना था कि “सच बोलना अच्छा है, किन्तु सच जीना और अधिक अच्छा है।” उन्होंने इस बोध वाक्य को अपने जीवन में पूरा उतार कर दिखाया।

सरोजिनी का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में हुआ। माता-पिता दोनों को अनेक भाषाओं का ज्ञान था जो विरासत में सरोजिनी को प्राप्त हुआ। वे 11 वर्ष की अल्पायु से ही कवितायें लिखने लगीं थी। 12 वर्ष की आयु में मैट्रिक पास किया वह भी प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान लेकर कविता के साथ नाटक लेखन भी किया। उनके लिखे नाटक से प्रभावित होकर हैदराबाद के निजाम ने विदेश जाकर पढ़ने के लिये छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जिसके फलस्वरूप इन्हें लंदन किंग्स कॉलेज में पढ़ने का अवसर मिला जहाँ पढ़ाई के साथ ही ये साहित्य सृजन में लग गईं।

नव जागरण का शंखनाद करने वाले राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत उनके गीतों ने जनमानस को झकझोरा, कोटि-कोटि कंठों में उनकी अनुगूंज उठी और मधुर स्वर की कोकिल कंठी कवयित्री भारत कोकिला की उपाधि से विभूषित हो गई। सरोजनी एक जन्मजात कवयित्री, समर्पित देशभक्त, कुशल राजनीतिज्ञ और प्रभावशाली वक्ता थीं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस विलक्षण नारी में वीरांगना का ओज, कुशल नेत्री की संगठन क्षमता, प्रशासक की कार्य कुशलता के साथ गृहिणी के आदर्श सभी गुण घुले-मिले थे।

1898 में इंग्लैण्ड से लौटकर एक फौजी डॉक्टर एम गोविन्द राजुलु नायडू से विवाह करके वे सरोजनी से सरोजनी नायडू बन गई और सुखमय वैवाहिक जीवन जीते हुए चार बच्चों की माँ बनीं और उनकी ममतामयी परवरिश की। 24 वर्ष की आयु में उन्होंने राजनीतिक यात्रा प्रारम्भ की।

1902 में कलकत्ता में इनके ओजस्वी भाषण से प्रभावित होकर गोखले जी ने उन्हें राजनीति में आगे बढ़ाया। 1914 में लंदन में गाँधी जी से इनकी मुलाकात हुई। देश की राजनीति में कदम रखने से पहले वह दक्षिणी अफ्रीका में गाँधी जी के साथ काम कर चुकी थी। भारत लौटने के बाद तुरन्त ही वह राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हो गई। उनकी राजनीतिक सक्रियता ने देश की असंख्य महिलाओं में आत्म विश्वास उत्पन्न किया। वे देश में आँधी की तरह घूमतीं और स्वाधीनता का संदेश फैलातीं। समय बीतने के साथ वे कांग्रेस की प्रवक्ता बनीं। तब देश की आजादी के बारे में बोलने का एक भी अवसर उन्होंने हाथ से जाने नहीं दिया। पहले कवयित्री फिर स्वतंत्रता सेनानी और देश के स्वतंत्र होने पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल पद पर आसीन हो, शासक बनकर श्रीमती नायडू अपनी हर भूमिका में सफल रहीं।

भारतीय स्त्रियों के लिये उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। शिक्षा, जागृति, पर्दा, बाल-विवाह, दहेज, स्वतंत्रता और समानाधिकार के लिये वे जीवन पर्यंत लड़ती रहीं। 1917 के महिला मताधिकार आंदोलन के सूत्रपात का कार्य भी बहुत महत्वपूर्ण था। डा. एनी बिसेंट द्वारा स्थापित होम रुल लीग के साथ उनका निकट संबंध रहा। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की संस्थापिकाओं में से वे एक थीं। सम्मेलन की 1930 की कांफ्रेंस की अध्यक्षता भी उन्होंने की थी। उन्हें अपने भारतीय नारी होने का गर्व था। वे कहा करती थीं मैं उस जाति की वंशज हूँ, जिसमें सावित्री का साहस, सीता की पवित्रता, द्रौपदी की निष्ठा, दमयंती का आत्मविश्वास और जीजाबाई की प्रेरक ममता हमारे आदर्श हैं।”

2 मार्च 1949 को विलक्षण व्यक्तित्व की स्वामिनी सरोजनी नायडू का जीवात्म पंछी उनकी इस नश्वर देह को छोड़ कर परमात्मा से जा मिला। उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ राजनिवास से विदा किया गया। उनके जन्मदिन 13 फरवरी को “भारतीय महिला दिवस” के रूप में मनाया जाता है। 13 फरवरी 1964 को भारत सरकार ने उनकी जयंती के अवसर पर सम्मान स्वरूप 15 नए पैसे का डाक टिकट जारी किया।

महादेवी वर्मा

कवियत्री, लेखिका एवं रेखा चित्रकार महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 ई. में होली के दिन हुआ था। यदि कोई इस बारे में पूछता तो वे कहती थीं कि मैं होली पर जन्मी, इसीलिये तो इतना हँसती हूँ। महादेवी जी की माता जी पूजा-पाठ के प्रति अत्यधिक आग्रही थीं, जबकि पिताजी अंग्रेजी प्रभाव के कारण इनमें विश्वास नहीं करते थे। फिर भी दोनों ने जीवन भर समन्वय बनाये रखा। इसका महादेवी के मन पर बहुत प्रभाव प

महान् कवियत्री महादेवी वर्मा का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब साहित्य सृजन के क्षेत्र में पुरुष वर्ग का वर्चस्व था, पर उन्होंने काव्य, समालोचना, संस्मरण, सम्पादन तथा निबन्ध लेखन के क्षेत्र में बहुत कार्य किया। महादेवी ने केवल साहित्य ही नहीं, सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी सशक्त उपस्थिति से समस्त नारी जाति का सिर गर्व से ऊंचा किया।

महादेवी को जीवन में पग-पग पर अनेक विडम्बनाओं का सामना भी करना पड़ा। फिर भी वे विचलित नहीं हुई। इनकी चर्चा उन्होंने अपने संस्मरणों में की है। महादेवी हिन्दी की प्राध्यापिका थीं, पर उन्होंने अंग्रेजी साहित्य का भी गहन अध्ययन किया था। उनकी इच्छा वेद, पुराण आदि को मूल रूप में समझने की थी। इसके लिये वे अनेक विद्वानों से मिलीं, पर अब्राह्मण तथा महिला होने के कारण कोई उन्हें पढ़ाने को तैयार नहीं हुआ। इसकी पीड़ा महादेवी वर्मा को जीवन भर रही।

महादेवी के हृदय की कोमल भावनायें उन्हें बचपन से ही कविता लिखने को प्रेरित करती थीं। सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने पहली कविता लिखी थी आओ प्यारे तारे आओ, मेरे आँगन में बिछ जाओ। रूढ़िवादी परिवार में जन्मी होने के कारण उनका विवाह नौ वर्ष की अवस्था में कर दिया गया, पर उनकी इच्छा पढ़ने और आगे बढ़ने की थी। इसलिये उन्होंने ससुराल की बजाये शिक्षा का मार्ग चुना। 1932 में उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिये विदेश जाना चाहती थीं, पर गांधी जी ने उन्हें नारी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने को प्रेरित किया। अतः उन्होंने प्रयाग में महिला विद्यापीठ महाविद्यालय की स्थापना की, जिसकी वे 1960 में कुलपति नियुक्त हुई। उन्होंने साहित्यकारों की सहायता के लिये प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ बनाई।

महादेवी के मन पर गाँधी जी का व्यापक प्रभाव था। बापू गुजराती और अंग्रेजी बहुत अच्छी जानते थे, फिर भी वे प्रायः हिन्दी में बोलते थे। महादेवी ने जब इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि हिन्दी भारत राष्ट्र की आत्मा को सहज ढंग से व्यक्त कर सकती है। तब से ही महादेवी वर्मा ने हिन्दी को अपने जीवन का आधार बना लिया। वे महाप्राण निराला को अपना भाई मानकर उन्हें राखी बाँधती थीं। उनके विशाल परिवार में गाय, हिरण, बिल्ली, गिलहरी, खरगोश, कुत्ते आदि के साथ-साथ लता तथा पुष्प भी थें अपने संस्मरणों में उन्होंने इन सबकी चर्चा की है। हिन्दी साहित्य में इन्हें छायावादी युग के चार प्रमुख स्तम्भों में से एक माना गया। इन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता था। इन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ। महादेवी को 1956 में पद्म भूषण, 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1988 में पदम विभूषण से सम्मानित किया था।

संवेदनशील होने के कारण बाढ़ आदि प्राकृतिक प्रकोप के समय वे पीड़ितों की खुले दिल से सहायता करती थीं। नारी चेतना और संवेदना की इस कवियित्री का स्वर 11 सितम्बर, 1986 को सदा के लिये मौन हो गया।

सुभद्रा कुमारी चौहान

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हर बोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी । खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ॥

इन काव्य पंक्तियों को सस्वर गाते कुछ ग्रामीण कलाकार, जबलपुर के पास नर्मदा किनारे एक छोटे से बाजार में मस्ती से झूम रहे हैं। उनके आसपास सुनने वालों का मेला लगा है और सस्ते अखबारी कागज पर छपी पर्ची सी कितबिया एक-एक आने में बिक रही है। उन खरीदने वालों से जब पूछा गया- ‘भाई, इसका लेखक कौन है?, उत्तर मिला, ‘जे तो नहिं मालूम, पर जै कितबिया बोत अच्छी है। हम जेहि ले जाके गावै करै- जइसे आल्हा-ऊदल गावत है न वइसे ही।’ और वे फिर गाने लगे।

इस कितबिया में ऐसा क्या था जिसने जनमानस को झकझोर दिया था। इसमें थी- सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘झाँसी की रानी’, वह मशाल जिसके सहारे गुलामी का अंधेरा काटने के लिये देश के युवा सिर पर कफन बाँध कर लड़ने मरने को तैयार हो जाते थे। उन्होंने लगभग 88 कविताओं और 46 कहानियों •की रचना की। परन्तु अमर कृति “झाँसी की रानी” ने कालजयी होकर कवियत्री को लोकप्रिय एवं कालातीत बना दिया।

सुभद्रा का जन्म 16 अगस्त 1904 को नागपंचमी के दिन इलाहाबाद के पास निहालपुर गाँव में हुआ। इलाहाबाद के क्रास्थवेट कॉलेज में पढ़ते हुए नौ वर्ष की अवस्था में इनकी प्रथम कविता प्रकाशित हुई। महादेवी वर्मा इनकी बचपन की सहेली थी। ये बचपन से ही अशिक्षा, अंध विश्वास, जाति-पाति आदि रुढ़ियों के विरुद्ध लड़ी।

सन् 1919 में ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से विवाह होने पर ये सुभद्रा कुमारी चौहान कहलाईं और जबलपुर आकर रहने लगी। उनके भीतर जो तेज था, काम करने का उत्साह था, कुछ नया करने की जो लगन थी, उसके लिये घर की सीमा बहुत छोटी थी। इसलिये उन्होंने जबलपुर में तिलक राष्ट्रीय विद्यालय में नौकर ले ली और विद्यालय कार्य के साथ-साथ स्त्रियों में जागृति लाने, छुआछूत की कुरीति एवं पर्दा प्रथा हटाने और स्वतंत्रता संग्राम के लिये स्वयंसेवकों को संगठित करने का काम करने लगी।

झण्डा सत्याग्रह में पंडित सुन्दरलाल, लाला भगवानदीन आदि संगठनकर्ताओं के साथ सुभद्रा ने उस क्षेत्र में पाँच हजार का धन संग्रह और पाँच हजार स्वयंसेवक जुटाकर दिये। सत्याग्रह में भाग लेकर गिरफ्तार होने वाली वे जबलपुर की पहली महिला थी। वे अपने वीरतापूर्ण काव्य के कारण भी देश भर में जन-जन में बस चुकी थीं।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने सुभद्रा जी की कवितायें देखकर उन्हें लोकल सरोजिनी कहा। इसी प्रकार नेताजी सुभाष ने रानी झाँसी वाली बहन के नाम से सम्बोधित किया। सन् 1936 के प्रांतीय चुनावों के समय जबलपुर की सुरक्षित महिला सीट के लिये इनका नामांकन करवाया और ये निर्विरोध चुनी गयी। 1941-43 के बीच का अधिकतर समय इनका जेल में ही कटा। अनेक अधिवेशनों और आंदोलनों में भाग लेते रहने और अस्वस्थता के कारण जर्जर शरीर होने पर भी वे निरन्तर यही कहती थी अब और नहीं जीना चाहती। निष्क्रिय रहना तो जैसे जीते जी मौत होगी और 15 फरवरी 1948 को एक सड़क दुर्घटना में मात्र 44 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हो गयी।

भारतीय तटरक्षक सेना ने 28 अप्रैल 2006 को नवनियुक्त एक तटरक्षक जहाज का नाम इनके नाम पर रख इन्हें सम्मान दिया है। भारतीय डाक तार विभाग ने इनके नाम पर 25 पैसे का डाक-टिकट 6 अगस्त 1976 को जारी कर इन्हें सम्मानित किया। इनके काव्य संग्रह मुकुल पर इन्हें केसरिया पुरस्कार सम्मानित किया गया। कवि मुक्तिबोध ने कहा है- “कुछ विशेष अर्थों में सुभद्रा जी का राष्ट्रीय काव्य हिन्दी में बेजोड़ है क्योंकि उन्होंने उस राष्ट्रीय आदर्श को जीवन में समाया है। उनमें एक ओर जहाँ नारी-सुलभ गुणों का उत्कर्ष है, वहीं वह स्वदेश प्रेम और देशाभिमान भी है जो एक क्षत्रिय नारी में होना चाहिये।