Category: इतिहास (History)

  • पोर्ट ब्लेयर का नाम बदलकर श्री विजयपुरम किया गया: यात्रा गाइड और ऐतिहासिक जानकारी

    पोर्ट ब्लेयर का नाम बदलकर श्री विजयपुरम किया गया: यात्रा गाइड और ऐतिहासिक जानकारी

    भारत सरकार ने हाल ही में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर का नाम बदलकर ‘श्री विजयपुरम’ कर दिया है। यह ऐतिहासिक कदम भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम की महिमा को फिर से उजागर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। पोर्ट ब्लेयर नाम बदलने से न केवल राष्ट्रीय गौरव बढ़ेगा, बल्कि द्वीपसमूह के ऐतिहासिक महत्व को भी सम्मानित किया जाएगा।

    श्री विजयपुरम (पूर्व में पोर्ट ब्लेयर) की यात्रा

    श्री विजयपुरम (पोर्ट ब्लेयर) एक अद्भुत गंतव्य है, जो समुद्र के नीले पानी, घने जंगलों, और ऐतिहासिक धरोहरों से भरा हुआ है। यहां की यात्रा आपके जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बन सकती है।

    कैसे पहुंचे?

    • वायु मार्ग: श्री विजयपुरम तक पहुंचने के लिए हवाई यात्रा सबसे सुविधाजनक तरीका है। भारत के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता से सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं।
    • समुद्री मार्ग: चेन्नई और कोलकाता से नियमित जहाज सेवाएं भी उपलब्ध हैं, जो 3 से 4 दिन का सफर होता है। यह यात्रा रोमांचक और एक अद्भुत अनुभव प्रदान करती है।
    Beautiful tropical beach and sea with coconut palm tree for travel and vacation
    Beautiful tropical beach and sea with coconut palm tree for travel and vacation- Credit – FreePik

    कहाँ ठहर सकते हैं?

    • लक्ज़री होटल्स: यदि आप आरामदायक और प्रीमियम आवास की तलाश में हैं, तो श्री विजयपुरम में कई अच्छे होटल्स और रिसॉर्ट्स मौजूद हैं। जैसे कि ताज एक्जोटिका रिज़ॉर्ट और सी शेल्स पोर्ट ब्लेयर
    • बजट होटल्स: जो यात्री बजट में रहना पसंद करते हैं, उनके लिए भी यहाँ कई अच्छे और किफायती होटल्स उपलब्ध हैं, जैसे एमरल्ड वियु रिजॉर्ट और आइलैंड टूर्स गेस्ट हाउस
    Aerial view of beautiful tropical beach and sea with palm and other tree in koh samui island for travel and vacation
    Aerial view of beautiful tropical beach and sea with palm and other tree in koh samui island for travel and vacation- Credit – FreePik

    देखने लायक जगहें

    1. सेल्यूलर जेल (Cellular Jail): भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का प्रतीक सेल्यूलर जेल, जिसे काला पानी के नाम से भी जाना जाता है। यह जेल अंग्रेजों द्वारा भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को कैद करने के लिए बनाया गया था। यहां एक लाइट एंड साउंड शो भी आयोजित होता है जो इस ऐतिहासिक स्थल की महत्ता को और भी बढ़ाता है।
    2. रॉस आइलैंड(Ross Island): पोर्ट ब्लेयर से कुछ ही दूरी पर स्थित रॉस आइलैंड एक शांतिपूर्ण और सुरम्य द्वीप है, जहां ब्रिटिश काल के अवशेष देखे जा सकते हैं। यह एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल, जो पहले ब्रिटिश प्रशासन का मुख्यालय था। यहाँ के खंडहर और खूबसूरत दृश्य इसे एक आकर्षक स्थल बनाते हैं।
    3. हैवलॉक द्वीप: सफेद रेतीले समुद्र तट और क्रिस्टल क्लियर पानी के लिए प्रसिद्ध, यह द्वीप स्कूबा डाइविंग और स्नॉर्कलिंग जैसे वाटर स्पोर्ट्स के लिए आदर्श स्थान है।
    4. वंडूर नेशनल पार्क: अंडमान के वंडूर नेशनल पार्क में आप समुद्री जीवन और कोरल रीफ्स की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं। यहां स्नॉर्कलिंग और बोट राइड्स का आनंद लेना भी एक यादगार अनुभव होता है।
    5. राधा नगर बीच (Havelock Island) – यह शानदार सफेद बालू और नीले पानी के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ डाइविंग और स्नॉर्कलिंग के शानदार अनुभव का आनंद लिया जा सकता है।
    6. संगम (Neil Island) – यह द्वीप शांत वातावरण और सुंदर समुद्री जीवन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ आपको सुंदर कोरल रीफ्स और नीले पानी की सुंदरता देखने को मिलेगी।
    7. राष्ट्रीय समुद्री पार्क (Ritchie’s Archipelago) – यह पार्क बहुपरकारी समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और जीव-जन्तुओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक अनूठी जैव विविधता देखने को मिलती है।

    अंडमान और निकोबार का इतिहास

    अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काफी दिलचस्प है। यह द्वीप समूह का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। यह द्वीपसमूह प्राचीन समय से व्यापारियों और यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। 18वीं शताब्दी में ब्रिटिशों ने यहां एक जेल का निर्माण किया, जिसे काला पानी के नाम से जाना गया। यह जेल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की तपस्या और बलिदान की गाथा कहता है। यह जेल अब एक स्मारक के रूप में संरक्षित है और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।

    नया नाम ‘श्री विजयपुरम’ भी इसी गौरवपूर्ण इतिहास की याद दिलाता है, जो विजय और स्वतंत्रता की भावना को दर्शाता है।

    Aerial view of sandy beach with tourists swimming in beautiful clear sea water of the Sumilon island beach landing near Oslob, Cebu, Philippines. - Boost up color Processing.
    Aerial view of sandy beach with tourists swimming in beautiful clear sea water of the Sumilon island beach landing near Oslob, Cebu, Philippines. – Boost up color Processing.- Credit – FreePik

    यात्रा के सुझाव

    • बेस्ट टाइम: अंडमान और निकोबार द्वीपों की यात्रा का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मई के बीच होता है, जब मौसम सुहावना और समुद्र शांत रहता है।
    • सावधानियां: यहां पर यात्रा के दौरान समुद्र की लहरों और सूरज की तेज किरणों से बचाव के लिए सनस्क्रीन और धूप के चश्मों का उपयोग करें। साथ ही, पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए प्लास्टिक का उपयोग न करें।
    Aerial view of sandy beach with tourists swimming in beautiful clear sea water of the Sumilon island beach landing near Oslob, Cebu, Philippines. - Boost up color Processing.
    Aerial view of sandy beach with tourists swimming in beautiful clear sea water of the Sumilon island beach landing near Oslob, Cebu, Philippines. – Boost up color Processing. – Credit – FreePik

    श्री विजयपुरम की यात्रा आपको इतिहास, प्रकृति और रोमांच का अनूठा संगम प्रदान करती है। यदि आप एक शांत और रोमांचकारी छुट्टी की तलाश में हैं, तो यह द्वीपसमूह आपके लिए एक परफेक्ट डेस्टिनेशन हो सकता है।

    श्री विजयपुरम (पोर्ट ब्लेयर) एक खूबसूरत और ऐतिहासिक स्थल है, जो न केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता बल्कि उसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। यहाँ यात्रा करने से आपको एक अद्वितीय अनुभव मिलेगा और भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण हिस्से को जानने का मौका मिलेगा।

  • हिंदी दिवस: अपनी मातृभाषा का सम्मान और समर्पण

    हिंदी दिवस: अपनी मातृभाषा का सम्मान और समर्पण

    हर साल 14 सितंबर को पूरे देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमारे देश की प्रमुख भाषा हिंदी को विशेष रूप से उसका महत्व समझाने और इसे प्रोत्साहित करने के लिए समर्पित है। हिंदी दिवस का उद्देश्य हिंदी भाषा के विकास, उसके प्रयोग को बढ़ावा देना और हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखना है।

    हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है?

    14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया था। तभी से, इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारे जीवन का अहम हिस्सा है।

    हिंदी का महत्व

    1. सांस्कृतिक विरासत: हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति, साहित्य, और कला की धरोहर को संजोने और फैलाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके जरिए हम अपनी पारंपरिक कहानियाँ, कविताएँ, और लोक गीतों को नई पीढ़ी तक पहुँचा सकते हैं।
    2. राष्ट्रीय एकता: हिंदी देश के विभिन्न हिस्सों को एकजुट करने का काम करती है। यह एक साझा भाषा है जो विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के बीच संवाद को आसान बनाती है।
    3. वैश्विक पहचान: हिंदी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के कई हिस्सों में बोली जाती है। इसका ज्ञान हमारे लिए वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण संपत्ति है।

     

    हिंदी दिवस पर क्या करें?

    1. हिंदी में लेखन और पढ़ाई: अपने दैनिक कार्यों, ईमेल्स, और सोशल मीडिया पोस्ट्स को हिंदी में लिखें। इससे न केवल आपकी भाषा सुधार होगी, बल्कि आप दूसरों को भी प्रेरित करेंगे।
    2. हिंदी साहित्य पढ़ें: हिंदी साहित्य, जैसे कि कविता, उपन्यास, और कहानी संग्रह, पढ़ने की आदत डालें। इससे आपको हिंदी भाषा की गहराई और विविधता का अनुभव होगा।
    3. हिंदी भाषा के प्रचार में योगदान दें: स्थानीय स्कूलों और कॉलेजों में हिंदी भाषा की कार्यशालाएँ आयोजित करें। बच्चों और युवाओं को हिंदी के महत्व के बारे में जागरूक करें।
    4. हिंदी में बातचीत: घर पर, दोस्तों के साथ, और अपने कामकाजी वातावरण में हिंदी में बातचीत करें। यह न केवल आपकी भाषा कौशल को बढ़ावा देगा, बल्कि हिंदी को प्रोत्साहित भी करेगा।
    5. हिंदी के कार्यक्रमों में भाग लें: हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों, जैसे कि भाषण, काव्य-पाठ, और नाटक, में भाग लें। इससे आप हिंदी भाषा की विविधता और सुंदरता को महसूस कर सकेंगे।

    हिंदी दिवस केवल एक विशेष दिन नहीं है, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक और भाषाई समृद्धि को मान्यता देने का एक अवसर है। आइए, हम सब मिलकर इस दिन को अपने भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान और समर्पण के रूप में मनाएँ।

  • भारत की महान नारियाँ – भाग 5

    उषा मेहता

    उषा मेहता स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी नायिका रहीं जिसने सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत रेडियो की स्थापना कर अल्पायु व अनुभवहीनता के बावजूद जोखिम भरा कदम उठाकर देश सेवा के महत्त्वपूर्ण कर्तव्य को पूर्ण किया।

    सूरत (गुजरात) के निकटवर्ती गाँव सरस में 25 मार्च 1920 को जन्म लेने वाली उषा को बालपन से ही बालसुलभ खिलौनों की अपेक्षा बम पिस्तोल आदि खिलौने अच्छे लगते थे। उन्हीं दिनों गाँधी जी ने महिलाओं और युवा वर्ग का आह्वान करते हुए शिविर का आयोजन उनके निकटवर्ती गाँव में किया तो यह नन्हीं बालिका छात्रा स्वतंत्रता सेनानियों की अग्रिम में जा खड़ी हुई और चरखे पर कताई भी की। तभी से इन्होंने खादी पहनने और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का प्रण किया।

    1928 में मात्र 8 वर्ष की उम्र में साइमन कमीशन के विरोध में निकले जुलूस में भाग लेकर ब्रिटिश राज का विरोध किया। इनके पिता ब्रिटिश राज के अधीनस्थ एक जज थे, वे इनके स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने पर नाराज होते थे। इसलिये पिता के सेवानिवृत्त हो जाने पर 1932 में इनका परिवार बम्बई जा बसा ताकि इन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने से रोका जा सके। परन्तु इन्हें तो एक ही जुनून ने घेरा हुआ था इसलिये ये अन्य बच्चों के साथ मिलकर ने क्लेंडेस्टाइन बुलेटिन और प्रकाशन का वितरण करती थीं। जेलों में क्रांतिकारियों और उनके रिश्तेदारों से मिलने जाना और उनके संदेश बाहर लेकर आना इनकी जीवनधारा का हिस्सा बन चुका था। (more…)

  • भारत की महान नारियाँ – भाग 4

    डॉ. ऐनी बेसेंट

    ‘भारत की संताने ही यदि हिन्दुत्व की रक्षा नहीं करेंगी, तो कौन आयेगा उसे बचाने ? हिन्दुत्व के बिना भारत क्या है एक निष्प्राण शरीर! भारत को बचाने के लिये हिन्दुत्व को बचाया जाना जरुरी है। अच्छी तरह समझ लीजिये, भारत और हिन्दुत्व एक ही हैं। बिना हिन्दुत्व के भारत का कोई भविष्य नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में यह चिंतन भारत तथा विश्व के सामने रखने वाली महान् विचारिका तथा स्वतंत्रता सेनानी श्रीमती ऐनी बेसेन्ट थीं।

    ऐनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन में हुआ ऐनी बेसेंट जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत- इतनी सारी भाषाओं की ज्ञाता एक आयरिश महिला थी जो शिकागों में स्वामी विवेकानन्द से मिलकर इतनी प्रभावित हुई कि भारत आयी और यहीं अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया वे अपने भाषणों में संस्कृत श्लोकों का धाराप्रवाह पाठ करती थी। वे भारतीय जीवन दर्शन से एकाकार हो गई थी।

    भारतीय जीवन दर्शन के प्रति आकर्षण के फलस्वरूप सन् 1894 में उनका भारत आगमन हुआ। भारत आने के उपरान्त 1906 ई. तक का अधिकांश समय बनारस में बीता और भारतीयों को अपनी महान् विरासत के प्रति सचेत करने के लिये उन्होंने 1898 ई. में बनारस में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की। सन् 1916 में पं. मदनमोहन मालवीय ने इसी कॉलेज को हिन्दू विश्वविद्यालय का नाम और स्वरूप दिया। डॉ. एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था- कर्म। उन्होंने समाज के सर्वांगीण विकास के लिये नारी के अधिकारों को महत्वपूर्ण बताया। (more…)

  • भारत की महान नारियाँ – भाग 3

    रानी दुर्गावती

    दुर्गावती का जन्म लगभग चार सौ वर्ष पूर्व कालिंगर के राजा कीर्तिराय की एकमात्र सन्तान के तौर पर हुआ। बाल्यकाल से ही दुर्गावती पुरुषों से भी बढ़चढ़ कर कुशलता और प्रवीणता से शस्त्र संचालन और घुड़सवारी करती थी। गढ़ मण्डला के राजा दलपति शाह ने जब एक बार दुर्गावती को अभ्यास करते हुए देखा तो प्रभावित होकर तुरन्त ही उस वीरांगना को अपनी अर्धागिनी बनाने का निश्चय कर लिया। दलपतशह से विवाह कर दुर्गावती गढ़ मण्डला की राजरानी बनी।

    वर्ष भर बाद ही उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई राजा और राज्य दोनों ही खुशी झूम उठे। रानी पारिवारिक जीवन का एक वर्ष का ही सुख प्राप्त कर पाई थी से कि वज्रपात हुआ। राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई। राजपरिवार के लोग राजा की चिता सजाने के साथ-साथ रानी को भी उनके साथ जलाने का प्रबन्ध करने लगे। परन्तु रानी ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा- “मुझे तो पति के साथ आग में जल जाना उनके सौंपे उत्तरदायित्वों से भागने जैसा ही लगता है। मैं एक ही मार्ग देखती हूँ उनके पदचिह्नों पर चलते हुए उत्तरदायित्वों को निभाने का।”

    इसके बाद रानी ने अपना अगला कदम अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा एवं दक्षता के साथ शासन व्यवस्था की सूत्रधार के रूप में उठाया। अब हर किसी को सुविधापूर्वक रानी से मिलने और अपने दुख-दर्द समस्याएँ कहने का मौका मिलने लगा। इस कारण जनता रानी को अपने प्राणों से भी अधिक चाहने लगी। (more…)

  • भारत की महान नारियाँ – भाग 2

    विदुषी उभय भारती

    मिथिला क्षेत्र अपने सांस्कृतिक ज्ञान के विभिन्न रूपों के लिये प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध था। मिथिला में एक से एक पंडित दूर-दूर से आते थे। वहाँ कई कई दिन तक चलने वाले शास्त्रार्थ में जीवन जगत से सम्बन्धित विषय पर वाद विवाद होता था। विजयी पंडितों को विशेष सम्मान मिलता था। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य मिथिला के महापंडित मंडन मिश्र के ज्ञान की ख्याति सुनकर उनके गाँव जा पहुँचे। वहाँ कुएं पर पानी भर रही महिलाएं संस्कृत में वार्तालाप कर रही थी, आचार्य शंकर के शिष्य ने उनसे पूछा- ‘मंडन मिश्र का घर कहाँ है?’ एक स्त्री ने बताया जिस दरवाजे पर तोते शास्त्रार्थ कर रहे हों, वही मंडन मिश्र का घर होगा।’ एक द्वार पर सचमुच तोते शास्त्रार्थ कर थे। वहीं मंडन मिश्र का घर था। शंकराचार्य ने शिष्यों सहित पं. मंडन मिश्र के घर प्रवेश किया। मंडन और उनकी पत्नी उभय भारती ने उनका स्वागत-सत्कार किया। आस पड़ोस के पंडित भी आ पहुँचे। शंकराचार्य ने मंडन मिश्र से कहा कि वे विषाद रूप भिक्षा लेने के लिये उनके पास आए हैं। मण्डन मिश्र ने स्वीकार किया और दोनों के बीच शास्त्रार्थ के लिये समय निर्धारित किया गया।

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  • भारत की महान नारियाँ – भाग 1

    सती अनुसूइया

    मातु पिता भ्राता हितकारी मितुप्रद सब सुनु राजकुमारी॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही

    वनवास के समय जब राम, लक्ष्मण और सीता जी सहित महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे तो वहाँ उनकी पत्नी अनुसूइया जी ने सीताजी को यही सुमंत्र दिया कि माता, पिता, भाई सभी हितकरने वाले होते हैं परन्तु वह सुख सीमित है। असीम सुख तो पति ही देने वाला है। उन्होंने बताया- वैदेही! बहुत विचार करने पर भी मैं पति से बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती तपस्या के अविनाशी फल की भांति वह इस लोक और परलोक में सर्वत्र सुख प्रदान करने वाला है।

    माता सीता को पतिव्रता धर्म की शिक्षा देने वाली सती अनुसूईया का भारतवर्ष की सती साध्वी नारियों में अग्रणी स्थान है। मनु की पुत्री देवहति और ब्रह्मर्षि कर्दम की पुत्री के रूप में जिस पुत्री ने जन्म लिया उसका नाम रखा गया अनसूया अनुसूइया अर्थात जिसके मन में किसी के प्रति असूय (ईर्ष्या) भाव न हो। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए। अपनी सतत सेवा व पावन प्रेम से इन्होंने पति हृदय को जीत लिया था। पतिव्रता और तपस्विनी होने के साथ-साथ नारी जाति के परम कल्याण का साधन पति सेवा को ही मानती थी। अपने पातिव्रत्य धर्म के कारण सती कहलाने वाली अनुसूइया के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है।

    एक बार विचरण करते हुए नारद जी ने त्रिदेवियों- लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को सती और पतिव्रता पत्नी अनुसूइया की प्रशंसा करते हुए बताया कि उनके समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है। त्रिदेवियों ने उसे अपना अपमान समझा और अपने-अपने पतियों त्रिदेवों से हठ कर उन्हें अनुसूइया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिये बाध्य कर दिया। ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों देव मुनि वेश में महर्षि अत्रि की अनुपस्थिति में उनके आश्रम पर पहुँचे। अतिथि रूप में तीनों मुनियों को आते देखकर पतिव्रता अनुसूइया ने उनका स्वागत सत्कार किया। किन्तु मुनियों ने देवी के आतिथ्य को अस्वीकार करते हुए कहा (more…)