डॉ. ऐनी बेसेंट

‘भारत की संताने ही यदि हिन्दुत्व की रक्षा नहीं करेंगी, तो कौन आयेगा उसे बचाने ? हिन्दुत्व के बिना भारत क्या है एक निष्प्राण शरीर! भारत को बचाने के लिये हिन्दुत्व को बचाया जाना जरुरी है। अच्छी तरह समझ लीजिये, भारत और हिन्दुत्व एक ही हैं। बिना हिन्दुत्व के भारत का कोई भविष्य नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में यह चिंतन भारत तथा विश्व के सामने रखने वाली महान् विचारिका तथा स्वतंत्रता सेनानी श्रीमती ऐनी बेसेन्ट थीं।

ऐनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 को लंदन में हुआ ऐनी बेसेंट जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत- इतनी सारी भाषाओं की ज्ञाता एक आयरिश महिला थी जो शिकागों में स्वामी विवेकानन्द से मिलकर इतनी प्रभावित हुई कि भारत आयी और यहीं अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया वे अपने भाषणों में संस्कृत श्लोकों का धाराप्रवाह पाठ करती थी। वे भारतीय जीवन दर्शन से एकाकार हो गई थी।

भारतीय जीवन दर्शन के प्रति आकर्षण के फलस्वरूप सन् 1894 में उनका भारत आगमन हुआ। भारत आने के उपरान्त 1906 ई. तक का अधिकांश समय बनारस में बीता और भारतीयों को अपनी महान् विरासत के प्रति सचेत करने के लिये उन्होंने 1898 ई. में बनारस में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की। सन् 1916 में पं. मदनमोहन मालवीय ने इसी कॉलेज को हिन्दू विश्वविद्यालय का नाम और स्वरूप दिया। डॉ. एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था- कर्म। उन्होंने समाज के सर्वांगीण विकास के लिये नारी के अधिकारों को महत्वपूर्ण बताया।

1883 ई. में समाजवादी विचारधारा के प्रति आकृष्ट होकर उन्होंने सोशलिस्ट डिफेंस संगठन नाम की संस्था बनाई। 1889 में थियोसोफी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास करते हुए भारत को थियोसोफी की गतिविधियों का केन्द्र बनाया और 1907 में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्षा निर्वाचित हुई। 1907 में जब सूरत काँग्रेस दो दलों में विभक्त हो गई तो दोनों दलों के बीच डॉ. ऐनी बेसेंट ने समझौता कराया।

होमरुल शब्द की चर्चा सर्वप्रथम आयरलैण्ड में हुई तो डॉ. एनी बेसेंट ने कुछ अंग्रेज मित्रों की सहानुभूति पाकर लंदन में भी होमरुल लीग फार अपने इण्डिया की स्थापना कर भारत में ही होमरुल लीग बना डाली। होमरुल का अर्थ था- भारतीयों को अपने देश में शासन स्वयं करने का अधिकार मिले। 1919 में जलियाँवाला बाग काण्ड के बाद में जब उन्होंने देशभर का दौरा किया तो अनेक स्थानों पर होमरूल लीग की शाखाएं स्थापित की।

उन्होंने कलम द्वारा आजादी की लड़ाई लड़ी। उनके द्वारा निकाले गए पत्र कॉमन विल और न्यू इण्डिया को 1913 में प्रतिबंधित कर दिया गया और 15 जून 1917 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1921 में उन्होंने नेशनल कन्वेंशन नाम से एक नया आंदोलन चलाया। उसी के परिणामस्वरूप 1925 में कॉमन वेल्थ ऑफ इंडिया बिल ब्रिटिश पार्लियामेंट में रखा गया था। अनेक विद्वानों का मानना है कि 1925 में डॉ. एनी बेसेंट के नेशनल कनवेंशन पर आधारित कॉमन वेल्थ ऑफ इण्डिया बिल पास हो जाता तो भारत को आजादी कई साल पहले मिल जाती, वह भी बिना विभाजन की पीड़ा के।

भारत में आकर भारतीय नागरिकता ग्रहण करने वाले अनेक विदेशी नाम मिल जायेंगे पर भारत को अपनी मातृभूमि समझने वाली भारतीय समाज व्यवस्था में गहरी आस्था रखने वाली भारतीय जीवन दर्शन में एकाकार होने वाली डॉ. एनी बेसेंट ही हो सकती हैं। वे महिला प्रगति का आधार हिन्दू दर्शन में खोजती थीं। 1917 में जब वे काँग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनी तो उन्होंने महिला मताधिकार आदि महिला हित के अनेक कदम उठाए। वे जन्म से

आयरिश, विवाह से अंग्रेज और आस्था एवं श्रद्धा से भारतीय थीं। उनकी मृत्यु 20 सितम्बर 1933 को 86 वर्ष की आयु में हुई।

सुशीला दीदी

सुशीला दीदी का जन्म 5 मार्च 1905 को पंजाब के दन्तो चूहड़ गाँव में हुआ। पिता डा. कर्मचन्द फौज में मेडिकल अफसर थे। दीदी की शिक्षा जालन्धर कन्या राष्ट्रीय महाविद्यालय में हुई। जहाँ सन् 1921 से 1927 तक पढ़ते हुए विद्यालय की भूतपूर्व प्राचार्या स्वतंत्रता सेनानी कु. लज्जावती और तत्कालीन प्राचार्या शत्रो देवी दोनों ने दीदी में राष्ट्रप्रेम की भावना कूट-कूट कर भर दी थी और फिर दीदी ने अनेक प्रकार से क्रांतिकारियों के साथ देश सेवा की थी।

1926 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में नेशनल स्कूल से आए छात्रों के साथ सुशीला दीदी की भेंट हुई जिनमें भगत सिंह, भगवती चरण बोहरा और दुर्गा भाभी भी शामिल थे। शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा स्थापित संस्था ‘हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ के सदस्य बन चुके भगवतीचरण, भगतसिंह, सुखदेव और यशपाल आदि ने सुशीला दीदी और दुर्भा भाभी को भी इसका सदस्य बनाया और संघ की ओर से गोपनीय पर्चे बाँटने का काम दिया। दीदी ने इस प्रकार योजना बनाई कि नगर के लगभग सभी प्रमुख लोगों के पास पर्चा एक ही दिन में पहुंच गया। शासन के बड़े-बड़े अफसरों के पास वह पर्चा डाक से भेजा गया। इससे जालन्धर में तहलका मच गया।

दीदी को जालन्धर छोड़कर कलकता जाना पड़ा जहाँ उनका परिचय नेताजी से नेताजी के नेतृत्व में कलकत्ते में साइमन कमीशन के सुभाष स हुआ। विरोध में जो जुलूस निकला उसमें तिरंगा हाथ में थामे दीदी सबसे आगे चली। क्रांतिचक्र का प्रवर्तन और तेजी से होने लगा। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद का मिलन क्रांतिकारी आंदोलन के लिये नई बहार थी। अब उनके दल का नया नाम हिन्दुस्तान समाजवादी-प्रजातंत्र संघ पड़ा और कमाण्डर-इन-चीफ आजाद को बनाया गया। दल की गतिविधियों का संचालन करने के लिये मेरठ में भी एक सम्मेलन का आयोजन हुआ। दीदी भी इस दल की सदस्या थीं और उन्होंने क्रांतिकारियों का हर प्रकार से सहयोग किया।

लाहौर षड्यंत्र केस के बाद फरार भगत सिंह को यूरोपियन वेश में निकालकर जब दुर्गा भाभी कलकत्ता ले गई थीं, तब वहाँ स्टेशन पर सुशीला

दीदी ने ही उनका स्वागत किया और उनके सुरक्षित ठहराने का प्रबन्ध भी किया था। दिल्ली में वायसराय की ट्रेन को उड़ाने की योजना बनी तो इस काम में मदद के लिए भगवती चरण बोहरा ने दीदी को कलकत्ता से बुलवाया था और दीदी इस काम को बखूबी अंजाम देकर कलकत्ता लौट गई थी। काकोरी काण्ड की पैरवी के लिये दीदी ने अपनी शादी के लिये, रखा दस तोला सोना उठाकर दे दिया था। जेल में लम्बी भूख हड़ताल करके शहीद हुए यतीन्द्रदास का शव जब लाहौर से कलकत्ता पहुँचा तब दीदी ने आगे बढ़कर उसकी आरती उतारी थी।

आजाद ने दिल्ली में बम बनाने की फैक्टरी डाली तो दीदी ने भी फैक्टरी के कामों में हाथ भी बंटाया और बम भी बनाना सीखा। दिल्ली असेम्बली बम काण्ड के बाद जब भगत सिंह व साथियों को जेल से छुड़ाने के लिये एक्शन प्लान बना तो दीदी कलकत्ता से अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह से दल में काम करने के लिये दिल्ली आ गई दीदी और दुर्गा भाभी को अज्ञातवास का जीवन भी बिताना पड़ा था। क्योंकि दीदी के नाम दो वारंट थे। उन पर इनाम भी घोषित था। फिर भी 1932 की प्रतिबन्धित कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में फरार सुशीला दीदी ‘इन्दुमती’ नाम से एक महिला टोली का नेतृत्व करते हुए शामिल हुई। गिरफ्तार होकर इन्दुमती नाम से ही छः महीने की जेल भी काटी, पर उन्हें किसी ने पहचाना नहीं।

इलाहाबाद में दीदी बाबू पुरुषोत्तम दास टण्डन से मिलने गई और उन्हें अपने विषय में बताया तो उन्होंने दीदी को पिता समान स्नेह दिया। इलाहाबाद में रहते हुए आजाद के कहने पर वे लाहौर जेल जाकर भगत सिंह से कई बार मिलीं और पता लगाया कि भगत सिंह के बचाव के लिये क्या करना है। एक बार जालन्धर में अपनी प्राचार्या शन्नो देवी के घर दिल्ली के एक प्रसिद्ध वकील श्याम मोहन से मुलाकात हुई। श्याम मोहन और सुशीला दीदी ने एक दूसरे को समझा 11933 में दोनों ने विवाह कर लिया। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हुए दीदी ने 13 जनवरी 1963 को इस संसार से आजादी पूर्ण विदा लीं।

कमलादेवी चट्टोपाध्याय

बर्लिन का अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन, जहाँ सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रत्येक देश का अपना झण्डा फहरा रहा था परन्तु भारत का झण्डा तो वहाँ नहीं था। होता भी कैसे- भारत अंग्रेजों का गुलाम था इसलिये वहाँ तो यूनियन जैक को ही होना था, वहाँ तिरंगा कैसे लहरा सकता था ? परन्तु भारतीय प्रतिनिधिमंडल की नेत्री को यह तनिक भी सहन नहीं हुआ और उन्होंने खड़े होकर पुरजोर विरोध करते हुए कहा- “जब तक भारत को अपना झण्डा लगाने की अनुमति नहीं मिलती, यह प्रतिनिधि मण्डल इस सम्मेलन का विरोध करता है”- सम्मेलन की अध्यक्षा से वस्तुस्थिति को जानने के बाद सम्मेलन में भारतीय ध्वज लगाने की अनुमति मिल गई और रातोंरात अपनी साड़ी फाड़कर उससे तिरंगा तैयार कर सम्मेलन में प्रवेश करने वाली यह महिला थी- कमला देवी।

वही कमला देवी, जिन्होंने 1930 में ‘नमक सत्याग्रह’ के दिन बम्बई स्टाक एक्सचेंज के अहाते में बेधड़क घुसकर गैर कानूनी नमक की छोटी-छोटी पुड़ियाँ बेचकर आजादी की लड़ाई के लिये एक घंटे में लगभग 40 हजार रुपये चंदे के जुटा लिये थे। तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। कमला देवी ने अदालत के भीतर मजिस्ट्रेट को भी पुड़िया थमाते हुए कहा, ‘इन्हें खरीदो।’ इनका साहस देखकर मजिस्ट्रेट भी एक बारगी भौंचक्का रह गया और उसने कड़क कर पूछा, “ऐसी हरकत क्यों की?” इसका उत्तर उसे और भी कड़क मिला- “आप क्यों इस पापकर्म में डूबे हुए हैं? क्यों नहीं त्याग पत्र देकर अपने देशवासियों का साथ देते?’ – इस उत्तर का परिणाम था- नौ महीने का कठोर कारावास।

3 अप्रैल 1903 को मंगलौर में जन्मी कमला देवी का जीवन साहसिक घटनाओं का एक लम्बा सिलसिला रहा है। सबसे बड़ा साहसिक कदम उन्होंने तब उठाया जब 1919 में पति कृष्णराव की मृत्यु हो जाने पर सरोजिनी नायडू के भाई हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय से पुनर्विवाह कर लिया और कमला देवी चट्टोपाध्याय बन गई। एक विधवा द्वारा स्वयं पुनर्विवाह- यह किसी बवंडर से कम नहीं था। इन्होंने अनेक क्षेत्रों में ‘पहल’ की, कई संस्थाओं की स्थापना की।

सन् 1926 में जब पहली बार किसी महिला के चुनाव लड़ने का प्रश्न सामने आया तो कमला देवी का नाम ही सर्वसम्मति से चुना गया। इनका मानना था कि “जीत भले ही न हो, महिलाओं के लिये रास्ता तो खुलेगा।” और ये हारने के लिये भी सहर्ष तैयार हो गई। अगले वर्ष 1922 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में अग्रणी भूमिका निभाई और उसकी अध्यक्ष भी बनीं।

हरीन्द्रनाथ से विवाह के पश्चात् दोनों पति-पत्नी विदेश चले गये थे परन्तु भारत में • गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन का आह्वान होने पर देश सेवा का अवसर पाकर दोनों ही स्वदेश लौट आये। यहाँ आकर कमला जी सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में जुट गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति तक वे कांग्रेस की समर्पित कार्यकत्री रहीं परन्तु काँग्रेस को अपने लक्ष्य से हटते देख उसे भी छोड़ समाजवादी पार्टी से जुड़ गईं।

जेल जाना उन दिनों महिलाओं के लिये कोई नई बात नहीं थी पर कमला जी तो जैसे जेल की अतिथि ही थीं। छूट कर आतीं फिर कुछ कर बैठतीं और फिर जेल पहुँच जाती। 1930 से 1944 तक इनकी जेल यात्राएं निरन्तर चलती रहीं। 1948 में इन्होंने ‘भारतीय सहकारी संघ’ तथा 1951 ‘भारतीय नाट्य संघ’ की स्थापना की। 1952 में उपेक्षित पड़ी कलाओं के उद्धार और गरीबी का कष्ट झेल रहे कुशल कारीगरों की दशा सुधार के उद्देश्य से भारतीय हस्त शिल्प बोर्ड की स्थापना की।

अवेकनिंग ऑफ इन्डियन वूमेन, द ग्लोरी ऑफ इन्डियन हैण्डीक्राफ्टस सरीखी अनेक पुस्तकों की रचेता, स्वतंत्रता संग्राम की जुझारु नेता, सामाजिक क्रांति की अग्रदूत, बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी कमला देवी जी को 1955 में पद्मभूषण, 1966 में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का रैमन मैग्सेस, पद्म भूषण और 1987 में पद्म विभूषण के पुरस्कारों से अलंकृत कर सम्मानित किया गया। कमलाजी ने 29 अक्टूबर 1988 को इस राष्ट्र के प्रति अपनी सेवाओं को सम्पन्न कर इस भूलोक को अलविदा कह परलोक गमन किया।

दुर्गा भाभी

15 अक्टूबर 1999 को (चारों ओर) लोगों की जुबां पर एक ही बात थी कि दुर्गा भाभी नहीं रहीं, दुर्गा भाभी हमें छोड़ गईं, इस चर्चा से नई पीढ़ी यह जानने को व्यग्र थी कि आखिर कौन हैं यह दुर्गा भाभी? इन्हें सभी भाभी के नाम से ही क्यों पहचानते हैं?

जब जे.पी. सांडर्स की हत्या के बाद भगतसिंह और राजगुरू को लाहौर से बाहर पहुंचाना था। तब अफसर की वेशभूषा में सजे भगतसिंह और उनके पीछे ऊँची एड़ी के सैण्डिल पहने, कंधे पर पर्स लटकाए (जिसमें एक रिवाल्वर भी थी) किसी अफसर की पत्नी की उसक से चलने वाली वह महिला थीं दुर्गा भाभी साथ में था उनको तीन वर्ष का बेटा शचीन्द्र जो अपने चाचा भगतसिंह की गोद में था और सबके पीछे नौकर के भेष में बगल में बिस्तर दबाए राजगुरू चल रहे थे। सबसे विशेष बात यह थी कि लाहौर से बाहर निकलने की योजना दुर्गा भाभी के पति की अनुपस्थिति में बनी थी और रेलगाड़ी के किराए के रूपये भी भाभी ने दिए थे। भाभी के पति भगवती चरण बोहरा बम बनाने का प्रशिक्षण लेने उन दिनों कलकत्ता पहुँचे हुए थे। जब भाभी भगतसिंह और राजगुरू के साथ कलकत्ता पहुँची तब उन्हें देखकर भगवती भाई ने उनकी पीठ थपथपाते था-? आज लगा कि ये एक क्रान्तिकारी की पत्नी है।’ हुए कहा

भाभी! भाभी! यह शब्द लाहौर की बहावलपुर रोड वाली उस कोठी में गूंजता रहता था जहाँ भगवती चरण वोहरा क्रान्तिकारी संगठन के लिए धन जुटाने से लेकर बम बनाने तक के सभी कार्यों को संभालते थे और उनकी पत्नी दुर्गा देवी वोहरा जान हथेली पर लिए फिरने वाले इन देवरों की ऐसी आवभगत करती थीं कि वे सभी उनके लक्ष्मण बने हुए थे। एक दिन कोठी में अचानक बम धमाका हो जाने से दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी को गोला-बारूद से भरी अटैचियों के साथ भागना पड़ा। भागने के बाद वे दोनों चन्द्रशेखर आजाद के साथ लाला अचिंत्यराम की पत्नी सत्यवती के साथ उनके घर पर रहीं। पुलिस सरगर्मी से इनकी तलाश कर रही थी इसलिए ये छिपती-छिपाती फरारी का

जीवन बिता रही थीं और बार-बार जगह बदल रही थीं। कुछ दिन सुप्रसिद्ध हिन्दी सेवी पुरूषोत्तम दास टण्डन ने भी उन्हें बेटियों की तरह अपने घर में रखा।

भाई भगवती चरण वोहरा बम बनाते उनका परीक्षण भी स्वयं ही करते थे। एक बार रावी के तट पर परीक्षण के लिए वे बम को देख ही रहे थे कि बम उनके हाथों में ही फट गया और 28 मई 1930 को वहीं पर उनकी मृत्यु हो गई। भाभी के पति की मृत्यु के बाद आजाद ही उनके संरक्षक और अभिभावक थे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के एलफ्रेड पार्क में उनकी शहादत के बाद भाभी को आश्रय पाने के लिए इधर-उधर ।। उन्हें स्वयं से अधिक ना चिंता अपने बेटे शचीन्द्र की थी। स्वयं किसी स्थान पर रहतीं तो बेटे को किसी और स्थान पर रखती थीं।

जेल में भगतसिंह के साथ भूख हड़ताल पर बैठने वाले साथी जतिन दास जब हड़ताल के 63वें दिन 13 सितम्बर 1929 को शहीद हो गए तो उनकी शव यात्रा को लाहौर से कलकत्ते तक पहुँचाने वाली भाभी ही थीं।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सजा दिलवाने में विशेष योगदान करने वाले बम्बई के गवर्नर हैली को सबक सिखाने के लिए भाभी ने तीन अन्य क्रान्तिकारियों के साथ लेमिंटन रोड पुलिस स्टेशन पहुँचकर गोलियों की बौछार कर दी। लेमिंटन शूटिंग केस नाम से प्रसिद्ध दस व्यक्तियों पर चले इस केस में 4 मई 1931 को हाई कोर्ट ने सभी को निर्दोष घोषित कर दिया।

आजादी के संघर्ष में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ने वाली तथा क्रान्तिकारियों को मातृछाया प्रदान करने वाली दुर्गा भाभी ने शेष जीवन नन्हें मुन्नों में राष्ट्रीय संस्कार भरने के लिए अध्यापन कार्य करते हुए बिताया।

रानी गाइडिन्ल्यू

देश को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिये भीषण यातनायें सहने वाली भारत माँ की सुपुत्री गाइडिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 को नागाओं की रांगभेयी जनजाति में मणिपुर के तमिंगलॉग जनपद के लाँगकाओ गाँव में हुआ। आठ बहन-भाइयों में इनका स्थान पाँचवा था। इनके इलाके में विद्यालय के अभाव के कारण इन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकी। केवल 13 वर्ष की अवस्था में ही गाइडिन्ल्यू अपने चचेरे भाई जादोनांग के आंदोलन से प्रभावित हुई। जादोनांग प्रथम विश्व युद्ध में लड़ चुके थे। युद्ध के बाद अपने गाँव में आकर उन्होंने तीन नागा कबीलों जेमी, त्यांगमेयी और रांगमयी में एकता स्थापित करने हेतु ‘हराका’ पंथ की स्थापना की। आगे चलकर ये तीनों सामूहिक रूप से जेलियाँगरांग कहलाए। इसके बाद वे अपने क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने का प्रयास में लग गये।

गाइडिन्ल्यू ने अब ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खुला विद्रोह शुरु कर दिया और जेलियांरांग लोगों से अंग्रेजों को कर देने के लिये मना कर दिया। बहुत सारे नागाओं ने गाइडिन्ल्यू को चंदा दिया और उनके अनुयायी हो गये। इससे अंग्रेज नाराज हो गये। पर नागाओं ने गाइडिन्ल्यू के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। आंदोलनरत गाँवों पर सामूहिक जुर्माना लगाकर उनकी बंदूकें रखवा लीं। 17 वर्षीय गाइडिन्ल्यू ने इसका विरोध किया। वे अपनी नागा संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहती थीं। उनके साहस एवं नेतृत्व क्षमता को देखकर लोग उन्हें देवी मानने लगे।

अब अंग्रेज गाइडिन्ल्यू के पीछे पड़ गये। गाँवों में उनके चित्र वाले पोस्टर दीवारों पर चिपकाये गये और उन्हें पकड़वाने वाले को 500 रुपये पुरस्कार देने की घोषणा कर दी गयी पर कोई इस लालच में नहीं आया। अब गाइडिन्ल्यू का प्रभाव उत्तरी मणिपुर, खोनोमा तथा कोहिमा तक फैल गया। नागाओं के अन्य कबीले भी उन्हें अपना नेता मानने लगे। 1932 में गाइडिन्ल्यू ने पोलोमी गाँव में एक विशाल काष्ठ दुर्ग का निर्माण शुरु किया, जिसमें चालीस हजार योद्धा रह सकें। जब दुर्ग बन रहा था तभी कैप्टन मैकडोनल्ड के नेतृत्व में असम राइफल्स की एक टुकड़ी ने अचानक आक्रमण कर गाइडिन्ल्यू और उनके अनुयायियों को 17 अक्टूबर 1932 को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पहले कोहिमा और फिर इम्फाल जेल ले जाया गया जहाँ उन पर मुकद्दमा चलाया गया। उन पर राजद्रोह के भीषण आरोप लगा कर 14 साल के लिये जेल भेज दिया गया।

1933 से 1947 तक गाइडिन्ल्यू गोहाटी, शिलाँग, आइजोल और तुरा आदि विभिन्न जेलों में रहीं। 1937 में जब पं. नेहरू असम के प्रवास पर आए तो वे गाइडिन्ल्यू से मिले। नेहरू सहित अनेक नेताओं ने गाइडिन्ल्यू की मुक्ति के प्रयास किये। परन्तु ब्रिटिश भारत के राज्य सचिव ने इस प्रार्थना को यह कहते हुए नकार दिया कि रानी के रिहा होने पर विद्रोह की मुसीबतें बढ़ सकती हैं।

1946 में भारत की अन्तरिम सरकार बनने पर तुरा जेल से 14 वर्ष बाद गाइडिन्ल्यू की रिहाई हुई। रिहाई के बाद वे अपने लोगों के उत्थान के लिये कार्य करने लगीं। और प्रधानमंत्री नेहरू जी से दिल्ली में जेलियांरांग लोगों के विकास और उत्थान के विषय में विमर्श के उद्देश्य से मिलीं। 1958 में कुछ नागा संगठनों ने विदेशी मिशनरियों की शह पर नागालैण्ड को भारत से अलग करने का हिंसक आंदोलन चलाया। गाइडिन्ल्यू ने उनका प्रबल विरोध किया। इस पर वे उनके प्राणों से प्यासे हो गये। इस कारण उन्हें 6 वर्ष तक भूमिगत रहना पड़ा। इसके बाद भी वे अपने जन्मस्थान लाँगकाओ लौट आईं। 17 फरवरी 1993 को 78 वर्ष की आयु में “पर्वतों की बेटी” “नागा रानी” गाइडिन्ल्यू का निधन हो गया।

गाइडिन्ल्यू अपने क्षेत्र के ईसाईकरण की विरोधी थीं। वे वनवासी कल्याण आश्रम और विश्व हिन्दू परिषद् के अनेक सम्मेलनों में गयीं। आजीवन अविवाहित रहकर नागा जाति, हिन्दू धर्म और देश की सेवा करने वाली गाइडिन्ल्यू को भारत र ने 1972 में स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार, 1981 में पदमभूषण और 1983 में विवेकानन्द सेवा पुरस्कार एवं मरणोपरान्त बिरसा मुण्डा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1996 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।