नन्ही सी एक कली

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नन्ही सी एक कली थी
अपने पापा के हाथों पली थी
हर गम हर दर्द से अनजान
पापा के सर माथे चढ़ी थी
हँसना खिलखिलाना सिर्फ ये ही तो जीवन था…..
कितने रिश्तों की भीड़ थी
सबके दिलो की डोर थी
दादी की लाडली बुआ कि दुलारी
यहां वहां दौड़ना बस ये ही तो काम था…
पढ़ते लिखते खेलते इठलाते
जवानी में कदम आगया
बहुत कुछ छूटा और बहुत कुछ पा लिया
अभी बस चाहा ही था कि जी भर के जीऊँगी अपनी जिंदगी पर…..
जैसे ही सपनो ने भरी उड़ान थी
अरमान कुछ उड़ने को ही थे
किस्मत को जाने क्या ठानी थी
रुखसत ए विदाई हो गयी
मेरे सपनों की टोकरी मानो जैसे टूट गयी और…… अब हाल ये होगये
हर मंजिल हर खुशी हर हसीं रूठ गयी
अपने पापा की वो
छुईमुई सी कली अब बुझ गयी….

……………..

मेधा शर्मा

 

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