जिसको भुलाने में साकी शायद ज़माने लग गए!!

जो न समझे नजाक़त-ए-वक्त वो ठिकाने लग गए,
आजकल निकम्मे आशिक खाने कमाने लग गए!!
वो दौर और था जब हुस्न नकाब़ मेँ चला करता था,
अब तो जिस्मदारोँ की अदाओँ के मैखाने लग गऐ!!
चँद नोटों के साथ जो हवा मेँ उड़ान भरा करते थे,
महँगाई के मारे वो भी दाल-रोटी खाने लग गए!!
जो सीखे थे गिनती गिनना मासूम हथेलियोँ पर,
वही बच्चे माँ-बाप को गलती गिनाने लग गए!!
वक्त लगता है बदलने वाला अब मेरे मुल्क का,
कल ही सुना था- गूँगे भी आवाज उठाने लग गए!!
जब से कहा किसी ने ‘हिँदी’ मेँ ‘उर्दू’ को मौसी,
हम ‘मस्जिद’ वो ‘मन्दिर’ मेँ सर झुकाने लग गए!!
कल मिली वो अचानक थी बाजार बरेली वाले मेँ,
जिसको भुलाने में साकी शायद ज़माने लग गए!!

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