बहुत अनजान सा रिश्ता है अपना
थोड़ा सुलझा बहुत अनसुलझा
क्यों गिरहा नही खोलते तुम मुझसे
मैं तेरे दिल का आईना बनना चाहती हूं…
सोचती बहुत हूँ
पूछती बहुत हूँ अपने दिल से
कि तुम्हारी बातें कहीं
छूती भी नही दिल को
पर तुम्हारे साथ सुबह पहली आँख खोलना चाहती हूं….
दिल को एक टीस खलती बहुत है
तुम सिमटे हो खुद में
क्यों रखते हो वो दूरी हमेशा
तुमसे तुम्हारी हर एक
बात करना चाहती हूं…
तुम मेरे हो सिर्फ मेरे
ये मानते हो तुम
फिर इस बात को
ज़ाहिर क्यों नही करते
तुम्हारे मुँह से ये बात
मैं सुनना चाहती हूं…
दुनियाँ घूम आओ तुम
पहन के नकली चोला
कोई फर्क नही पड़ता
जब आओ पास मेरे
तो उतार दिया करो वो चोला
मैं सिर्फ तुमको तुम्हारे
दिल को देखना चाहती हूँ…
थक के चूर होके जब
आओ न तुम पास मेरे
मेरी गोदी का सिरहाना
तुम्हारे सर के नीचे रखना चाहती हूं…
माथे पर आई वो पसीने की बूंदे
अपने दुप्पटे के आंचल से
पोछ देना चाहती हूं…
कि दुनियां जानती है तुमको
तुम्हारे रुतबे से मगर
मैं तेरे दिल को टटोलना चाहती हूं…
दे दो तुम दुनिया को
सारे जहां की खुशियां
फ़र्क नही मुझको
मैं तो सिर्फ तुमको
दुनिया जहाँ की
खुशियां देना चाहती हूँ…
मैं सिर्फ तुमको
सिर्फ तूमको चाहती हूँ…!
*मेधा शर्मा*
Category: हिन्दी कविताएं
हिन्दी कविताएं
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अनजान सा रिश्ता – मेधा शर्मा
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मेरे प्यार का ये शहर – *मेधा शर्मा*
हर आस मचल जाती है जहाँ हर सपना साकार सा लगता है
इसलिए ए दोस्त मेरे,वो सफ़र सुहाना होता हैखुशियों के मोती मिलते है,धड़कन को सुर मिल जाते हैं
सब कुछ मन चाहा होता है,हर गम जो छुप जाते हैंख्वाबों में तेरा आना ये मेरे बस की बात नही
ये तो प्रीत की डोर है दिल की,देखे कोई और बात नहीदेख अभी भी तो कैसे ये दिल मेरा एक तेरे इंतज़ार से रौशन है
तू ना आना चाहे फिर ये कैसे हो जाता गुमसुम हैहर ओर शनाइयां बज उठती,दिल ये शोर भी करता है
मेरे सूने सपने को एक,तेरा आना ही रंग भर सकता हैकहीं कमी तो छोडी मैंने जो हक़ीक़त को ना भेद सकी
वर्ना मेरा एक इशारा ही,पास तुझे ला सकता हैएक बार तू छोड़ दे अहं को आके मेरे पास बैठ
देख के मेरी तड़प से,मन तेरा भर सकता हैदेना बाँहों का घेरा मुझको न न चाहे बोले कुछ
तुम चुप चाप से अपने होंठ,मेरे होठों पे रख देना..मेरे प्यार का ये शहर है जो तेरे दिल में है बसता है….
इसीलिए ए दोस्त मेरे ,वो सफ़र सुहाना होता है….!!*मेधा शर्मा*
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अधूरा बचपन – *मेधा*
चिड़ियों सा चहकता हुआ करता था अपना आँगन
कितना खेली थी आपके साथ इस आँगन में पापा
अधूरा बचपन बीता आपके साथ इस आँगन में
वो खिलखिलाते दिन वो ठंडी रातें
दादी के साथ सवालों औऱ पहाड़ों में बीतती रातें
बहुत याद आती है आपकी जब जब भी जाती हूँ घर
दिल मे हूक सी उठाती हैं पापा आपकी यादें
वो दिन में सहेलियों संग वालिस्ता खेलना
गर्मी की छुट्टियों में बहनो संग महफ़िल जमाना
कितना सुहाना सा मंजर होता था उस आँगन में
मुझे याद है वो बिस्तर लगाना वहां
और भैया का वो डराना रातों में
कैसे दुबक जाती थी आके आपके बिस्तर में
क्यों चले गए यूँ छोड़ के बीच मे अपनी गुड्डा को
अब नही बैठती कोई भी चिड़िया उस आँगन में….