अनजान सा रिश्ता – मेधा शर्मा

बहुत अनजान सा रिश्ता है अपना
थोड़ा सुलझा बहुत अनसुलझा
क्यों गिरहा नही खोलते तुम मुझसे
मैं तेरे दिल का आईना बनना चाहती हूं…
सोचती बहुत हूँ
पूछती बहुत हूँ अपने दिल से
कि तुम्हारी बातें कहीं
छूती भी नही दिल को
पर तुम्हारे साथ सुबह पहली आँख खोलना चाहती हूं….
दिल को एक टीस खलती बहुत है
तुम सिमटे हो खुद में
क्यों रखते हो वो दूरी हमेशा
तुमसे तुम्हारी हर एक
बात करना चाहती हूं…
तुम मेरे हो सिर्फ मेरे
ये मानते हो तुम
फिर इस बात को
ज़ाहिर क्यों नही करते
तुम्हारे मुँह से ये बात
मैं सुनना चाहती हूं…
दुनियाँ घूम आओ तुम
पहन के नकली चोला
कोई फर्क नही पड़ता
जब आओ पास मेरे
तो उतार दिया करो वो चोला
मैं सिर्फ तुमको तुम्हारे
दिल को देखना चाहती हूँ…
थक के चूर होके जब
आओ न तुम पास मेरे
मेरी गोदी का सिरहाना
तुम्हारे सर के नीचे रखना चाहती हूं…
माथे पर आई वो पसीने की बूंदे
अपने दुप्पटे के आंचल से
पोछ देना चाहती हूं…
कि दुनियां जानती है तुमको
तुम्हारे रुतबे से मगर
मैं तेरे दिल को टटोलना चाहती हूं…
दे दो तुम दुनिया को
सारे जहां की खुशियां
फ़र्क नही मुझको
मैं तो सिर्फ तुमको
दुनिया जहाँ की
खुशियां देना चाहती हूँ…
मैं सिर्फ तुमको
सिर्फ तूमको चाहती हूँ…!
*मेधा शर्मा*

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